Tuesday, June 14, 2011
वन्य जीवन व वनस्पतियों पर संकट
वन्य जीवन के लिए चार प्रमुख खतरे हैं- प्रदूषण, वन्य जीवों के प्राकृतिक वास का नष्ट होना, उनका अंधाधुंध शिकार और प्रजातियों का स्थान परिवर्तन। हवा और पानी की प्रदूषण के मामले में अहम भूमिका है क्योंकि इन्हीं के जरिये जमीन और समुद्र में घातक रसायन (जहर) फैलने में मदद मिलती है। चाहे कारखानों से निकला धुआं हो या विषैला रसायन युक्त कचरा, ये दोनों हवा और पानी में मिलकर जीव-जंतुओं को प्रभावित करते हैं। कुछ जहर ऐसे होते हैं जो वर्षो तक नुकसान पहुंचाते रहते हैं। डीडीटी जैसा कीटनाशक 1972 से अमेरिका में प्रतिबंधित हैं। कारण, इससे वहां के पेरिग्रिन श्रेणी के बाज लगभग खत्म हो गए थे। लेकिन हमारे यहां फसलों पर आज भी डीडीटी का छिड़काव होता है। नतीजन अनेकों पक्षियों और तितलियों की प्रजाति इससे प्रभावित हैं। उनका अस्तित्व खतरे में है। इसका असर यदि एक बार पर्यावरण में हो गया तो यह कई वर्षों तक स्थायी बना रहता है। यह भोजनादि में पहुंचकर तो और भी सांद्रित हो जाता है। इसका इतना ज्यादा असर होता है कि पक्षियों के अंडों की ऊपरी परत पतली हो जाती है और जब वे उन्हें सेतने के लिए उन पर बैठते हैं तो अंडे हल्के से दबाव से टूट जाते हैं। बढ़ती आबादी और विकास की आवश्यकताओं की पूर्ति की खातिर जंगलों के सफाये से जैव विविधता को भंयकर खतरा है। गौरतलब है कि जब-जब कोई भी वनस्पति विलुप्ति के कगार पर पहुंचती है, उस पर भोजन व आश्रय के लिए प्रत्यक्षत: निर्भर रहने वाले जीव-जंतु स्वाभाविक रूप से संकटग्रस्त हो जाते हैं। नतीजन इन पर निर्भर प्रजातियां भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहतीं। क्योंकि इनका सारा जीवनतंत्र एक दूसरे से जुड़ा होता है, इसलिए इनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। इसमें दो राय नहीं है कि मानव अपने शौक, सजने-संवरने, घर की सजावट, फैशन, भोजन व दवाई आदि के लिए जीव-जंतुओं का शिकार करता आया है। वन्य जीवों के शिकार पर प्रतिबंध के बावजूद उनकी खाल, हड्डी आदि के लिए उनका शिकार जारी है। बाघ, गैंडा आदि ऐसे वन्य जीव हैं जिनके अंगों से चीन व कोरिया में पौरुषवर्धक दवाइयां बनती हैं। इसके चलते इनके शिकार में बढ़ोतरी हुई है। यही कारण है कि इन समेत भालू, चीता, व्ल्यू ह्वेल और माउन्टेन गोरिल्ला जैसी जीव प्रजातियां संकट में हैं। जीवों पर संकट के रूप में सबसे बड़ी समस्या प्रजातियों के स्थान परिवर्तन की है। कई प्रजातियों को उनके मूल स्थान से दूसरी जगह ले जाया जाता है तो उन्हें वहां भोजन और आवास जैसी समस्याओं से दो चार होना पड़ता है। साथ ही दूरदेश के माहौल में जब नई प्रजातियों का विकास होता है, तो वहां पहले से रहने-बसने वाली पुरानी और बाहर से आयी नयी प्रजातियों के बीच का संतुलन बिगड़ जाता है। कभी-कभी तो इस प्रक्रिया में कई जंतु विलुप्त हो गए और कई संकट में हैं। यही दुर्दशा वनस्पति की भी हुई। जहां तक प्रजातियों के विलोपन या विनाश का सवाल है, तो अधिकांशत: यह पर्यावरणीय परिवर्तन के कारण होता है। यह सतत प्रक्रिया है, घटना है। अधिकतर प्रजातियां बदले पर्यावरण के साथ सामंजस्य न बैठा पाने के कारण खुद मिट जाती हैं। कई बार कुछ जीव या वनस्पतियां बदली परिस्थिति, बदले पर्यावरण में सामंजस्य तो बिठा लेती हैं लेकिन इस दौरान नई प्रजाति में विकसित हो जाती हैं। जीवों और जीवाश्मों के विस्तृत अध्ययन में वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि पृथ्वी पर जीवन की कहानी महाविनाश जिसे हम पल्रय भी कह सकते हैं, के द्वारा अनेक बार खंड-खंड हुई लेकिन इसके कारणों पर आज भी संशय बना है। यह बहस का विषय अवश्य है लेकिन यह सच है कि कभी न कभी किसी छोटे ग्रह का पृथ्वी से टकराव हुआ, तेजी से ज्वालामुखी गतिविधियां घटित हुई, पर्यावरण परिवर्तन हुआ और वातावरण में अस्थिरता पैदा हुई। नतीजन अभी तक न जाने कितनी प्रजातियों का बहुत बड़ा हिस्सा विलुप्त हो गया है। चूंकि यह एक सतत घटना है, प्रक्रिया है, इसलिए यह स्पष्ट है कि बार-बार हुए महाविनाशों में हर बार बड़े पैमाने पर प्रजातियों का विनाश हुआ है। जीवाश्मों के अध्ययन, शोध और इनसे सम्बंधित दस्तावेज इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं। क्रेटेसश काल का महाविनाश जिसमें डायनासोर सहित बहुत बड़ी मात्रा में समुद्री जीवों के नष्ट होने के प्रमाण मिलते हैं, असलियत में किसी छोटे गृह के पृथ्वी से टकराने का परिणाम माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार लाखों वर्षो के अंतराल पर एक बार ऐसा महाविनाश होता है जिसका आकाशीय पिंड से सम्बंध होता है। शोध, अध्ययन, आंकड़े व तथ्य खुलासा करते हैं कि प्रजातियों पर इस तरह के संकट को नकारा नहीं जा सकता। हिमयुग से शुरू जीव-जंतुओं के सफाये की यह प्रक्रिया आज भी जारी है। लेकिन वर्तमान में मानवीय हस्तक्षेप द्वारा उनके प्राकृतिक आवास नष्ट किये जाने व दूसरी गतिविधियों ने और भी ज्यादा नकारात्मक भूमिका निभायी है।
Friday, June 10, 2011
इस साल और बढ़ेगा बिजली संकट
ईधन की कमी और पर्यावरण संबंधी अड़चनों के कारण चालू वित्त वर्ष के दौरान देश के बिजली उत्पादन में दस फीसदी की कमी आएगी। वर्ष 2010-11 में बिजली की कमी 8.5 प्रतिशत तक थी। ऐसे में वर्ष 2011-12 बिजली संकट और बढ़ेगा। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) ने कहा कि वर्ष 2011-12 के दौरान देश में बिजली की सामान्य समय में 10.3 फीसदी और व्यस्त समय में 12.9 प्रतिशत तक की कमी रहेगी। इस अनुमान के हिसाब से चालू वित्त वर्ष में बिजली की आपूर्ति मांग की तुलना में 9,636.7 करोड़ यूनिट कम रहेगी। वर्ष 2010-11 में बिजली की मांग 93,374.1 करोड़ यूनिट रहेगी, जबकि आपूर्ति 83,737.4 करोड़ यूनिट पर सिमटने की संभावना है। सीईए ने कहा कि देश के सभी क्षेत्रों को बिजली की कमी से जूझना होगा। पूर्वोत्तर क्षेत्र में बिजली कमी 0.3 प्रतिशत की रहेगी, वहीं पश्चिमी क्षेत्र में इसमें 11 प्रतिशत की कमी रहेगी। सीईए के अधिकारियों का कहना है कि बेहतर आर्थिक वृद्धि दर की वजह से देश में बिजली की मांग बढ़ती जा रही है। कुछ परियोजनाओं में देरी की वजह से बिजली की उपलब्धता कम है। सीईए के अनुसार, बीते वित्त वर्ष के दौरान बिजली की जरूरत में 3.7 प्रतिशत का इजाफा हुआ। इसी तरह व्यस्त समय में बिजली की मांग 6.5 प्रतिशत के अनुमान की तुलना में 2.6 फीसदी बढ़ गई। चालू वित्त वर्ष के लिए बिजली का सकल उत्पादन लक्ष्य 85,500 करोड़ यूनिट का है। हालांकि सरकार को 11वीं पंचवर्षीय योजना की शेष अवधि यानी 10 महीने में 16,000 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन की उम्मीद है। मौजूदा अनुमान के मुताबिक सरकार मार्च, 2012 तक 52,000 मेगावाट अतिरिक्त बिजली ही जोड़ने में कामयाब हो पाएगी, जो संशोधित 62,000 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन के लक्ष्य से कम है। बिजली मंत्रालय के एक अधिकारी ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस अतिरिक्त उत्पादन में 2,000 मेगावाट परमाणु बिजली शामिल है। अधिकारी के मुताबिक बिजली मंत्रालय ने 11वीं योजना अवधि में मई तक कुल बिजली उत्पादन में 36,000 मेगावाट अतिरिक्त बिजली जोड़ी है। उल्लेखनीय है कि सरकार ने 11वीं योजना के दौरान 78,000 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा था, जिसे मध्यावधि समीक्षा में योजना आयोग ने घटाकर 62,000 मेगावाट कर दिया था। हालांकि मंत्रालय ने महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, लेकिन कोयले की आपूर्ति में बाधा और पर्यावरण मंजूरी में देरी के कारण कई तापीय बिजली परियोजनाएं अटकी पड़ी हैं। कुल बिजली उत्पादन में सर्वाधिक हिस्सेदारी तापीय परियोजनाओं की ही है। मंत्रालय ने 12वीं पंचवर्षीय योजना (वर्ष 2012-17) के दौरान एक लाख मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखा है।
कोयले की किल्लत
पर्यावरण मंत्रालय की अड़ंगेबाजी पर लेखक की टिप्पणी
सरकार की तमन्ना आर्थिक विकास दर को सरपट दौड़ाने की है, लेकिन मंत्रालयों के एजेंडे और नीतियों के मकड़जाल के चलते उसकी इच्छा पूरी होने का नाम नहीं ले रही है। इसका ज्वलंत उदाहरण है बिजली उत्पादन में कमी। दरअसल बिजली क्षेत्र के अंधियारे को दूर करने के लिए ज्यादा कोयला चाहिए, लेकिन पर्यावरण मंत्रालय की नो गो एरिया नीति के चलते सैकड़ों कोयला ब्लॉकों में उत्पादन नहीं हो पा रहा है। हालांकि इस विवाद को सुलझाने के लिए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में मंत्रियों का उच्चाधिकार प्राप्त समूह (ईजीओएम) गठित किया गया, लेकिन उससे भी बात नहीं बनी। अब इस मुद्दे को 16 जून को कोयले की उपलब्धता बढ़ाने पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में होने वाली बैठक में उठाया जाएगा। कोयला मंत्रालय के मुताबिक नो गो क्षेत्र में पड़ने वाले 203 कोयला ब्लॉकों को मंजूरी नहीं मिलने से करीब 66 करोड़ टन सालाना कोयला उत्पादन के लक्ष्य में बाधा आ रही है। सूत्रों के अनुसार इन ब्लॉकों से कोयला उत्पादन की इजाजत मिलने पर देश में कोयले की कमी नहीं रहेगी। कोयला मंत्रालय का कहना है कि जहां कहीं भी उत्पादन कार्य किया गया, उन सभी जगहों पर नए वन विकसित करने में कोई कमी नहीं छोड़ी गई। लेकिन पर्यावरण मंत्रालय अपने निर्णय पर टस से मस नहीं हो रहा है। 2010-11 में देश में मांग के मुकाबले 8.3 करोड़ टन कोयले की कमी थी जिसके चालू वित्तीय वर्ष में 13.7 करोड़ टन और 2013-14 तक 20 करोड़ टन होने की उम्मीद है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के मुताबिक 2009-10 के दौरान कोयले की कमी से 14.5 अरब यूनिट बिजली का उत्पादन नहीं किया जा सका। कोयले की भारी किल्लत के कारण ऊर्जा मंत्रालय ने बिजली उत्पादन क्षमता में चालू वित्त वर्ष के लिए मात्र 7,675 मेगावाट के विस्तार की योजना बनाई है। इस प्रकार 11वीं योजना के लिए निर्धारित संशोधित लक्ष्य (62,000 मेगावाट) को भी हासिल करना मुश्किल है। ऐसे में 12वीं पंचवर्षीय योजना में एक लाख मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य दूर की कौड़ी ही साबित होगा। इस प्रकार मांग और आपूर्ति के बीच की खाई और बढ़ेगी। पिछले एक दशक में बिजली क्षेत्र में सुधार की तेज रफ्तार के बावजूद देश जरूरत के मुताबिक नई क्षमता नहीं जोड़ पाया तो इसका कारण कोयला उत्पादन में बाधा और मंत्रालयों में आपसी तालमेल की कमी ही है। इसी का नतीजा है कि देश के गांवों में ही नहीं शहरों में भी लोगों को छह-छह घंटे की कटौती से जूझना पड़ रहा है। भारत में कोयला उत्पादन संबंधी परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी मिलने में हो रही देरी और घरेलू आपूर्ति में आ रही परेशानियों को देखते हुए बिजली क्षेत्र की कंपनियां विदेशों में कोयला भंडारों में हिस्सेदारी खरीद रही हैं और आयात भी खूब कर रही हैं। यही कारण है कि कोयले के आयात में सालाना 10 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी हो रही है। कोयले की किल्लत को देखते हुए कोयला मंत्रालय नई कोयला वितरण नीति ला रहा है जिसके तहत विभिन्न परियोजनाओं के लिए कोयला आपूर्ति की स्थायी व्यवस्था की जिम्मेदारी से कोल इंडिया लिमिटेड को मुक्त कर दिया जाएगा। एक ओर ताप आधारित बिजली उत्पादन में गैस और डीजल की हिस्सेदारी नहीं बढ़ पा रही है तो दूसरी ओर कोयले के इस्तेमाल में बढ़ोतरी के साथ कार्बन उत्सर्जन का स्तर भी बढ़ता जा रहा है। भारत जहां कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए सुपर क्रिटिकल और अल्ट्रा क्रिटिकल पॉवर परियोजनाएं विकसित करने पर जोर दे रहा है वहीं चीन और अमेरिका स्वच्छ कोल तकनीक यानी बिना कार्बन के कोयला विकसित करने की ओर बढ़ रहे हैं। देर से ही सही हाल में सरकार ने स्वच्छ ऊर्जा तकनीक लागू करने का खाका तैयार करने के लिए एक कार्यदल गठित किया है। कार्यदल की सिफारिशें जून 2012 तक आ जाएंगी जिन्हें 2013 तक लागू किया जाएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Saturday, June 4, 2011
गंगा की अविरल धारा का सवाल
राष्ट्रीय नदी जीवनदायिनी गंगा को बचाने के लिए आखिरकार हमारी सरकार संजीदा हुई है।। आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी ने हाल ही में गंगा की सफाई के लिए सात हजार करोड़ रुपये की एक महत्वाकांक्षी परियोजना पर सर्वसम्मति से अपनी मुहर लगा दी है। तीव्र औद्योगीकरण, शहरीकरण और प्रदूषण से अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही गंगा को बचाने के लिए अब तक की यह सबसे बड़ी परियोजना होगी। हालांकि गंगा को साफ करने की पिछली परियोजनाओं की कामयाबी और नाकामयाबियों से सबक लेते हुए इस परियोजना को बनाया गया है। इसके तहत पर्यावरणीय नियमों का कड़ाई से पालन करना, नगर निगम के गंदे पानी के नालों, औद्योगिक प्रदूषण, कचरे और नदी के आस-पास के इलाकों का बेहतर और कारगर प्रबंधन शामिल है। कुल मिलाकर इस परियोजना का मकसद गंगा नदी का संरक्षण करना और पर्यावरणीय सुरक्षा को व्यापक योजना व प्रबंधन द्वारा बिगड़ने से बचाना है। गंगा की सफाई में आने वाली कुल लागत में से केंद्र 5,100 करोड़ रुपये खर्च का वहन करेगा, वहीं जिन पांच राज्यों से गंगा निकलती है, वहां की सरकारें 1900 करोड़ रुपये का खर्च उठाएंगी। 5100 करोड़ रुपये की जो भारी भरकम राशि केंद्र सरकार को खर्च करना है, उसमें से 4,600 करोड़ रुपये उसे विश्व बैंक से हासिल होंगे। बहरहाल, आठ साल की समय सीमा में पूरी होने वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना में ऐसे कई प्रावधान किए गए हैं कि यदि इन पर ईमानदारी से अमल किया गया तो गंगा नदी की पूरी तस्वीर बदल जाएगी। इस योजना के तहत गंगा सफाई अभियान को आगे बढ़ाने के लिए विशेष संस्थानों की स्थापना की जाएगी। इसके साथ ही स्थानीय संस्थाओं को भी मजबूती प्रदान की जाएगी, ताकि वे गंगा की सफाई में लंबे समय तक अपनी भूमिका निभा सकें। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जिम्मेदारी नदियों में प्रदूषण रोकना है, उसे पहले से और भी ज्यादा मजबूत बनाया जाएगा। इसमें भी सबसे बड़ी बात कि जो शहर गंगा के किनारे बसे हुए हैं, उन शहरों में निकासी व्यवस्था सुधारी जाएगी। औद्योगिक प्रदूषण को दूर करने के लिए विशेष नीति बनाई जाएगी। कहने को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कल-करखानों से निकलने वाले अपशिष्ट के लिए कड़े कायदे-कानून बना रखे हैं, लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद आज भी गंगा में इनका प्रवाह रुक नहीं पा रहा है। अकेले कानपुर में रोजाना 400 चमड़ा शोधक फैक्टि्रयों का तीन करोड़ लीटर अपशिष्ट गंगा में जाकर मिलता है। इसमें बड़े पैमाने पर क्रोमियम और जहरीले रासायनिक पदार्थ होते हैं। कमोबेश यही हाल बनारस का है। जहां हर दिन तकरीबन 19 करोड़ लीटर गंदा पानी बगैर शुद्धिकरण के खुली नालियों के जरिए गंगा में मिलता है। हालांकि देश में गंगा सफाई योजना को 25 साल से ज्यादा हो गए हैं और इसकी सफाई पर अभी तक अरबों रुपये भी बहाए जा चुके हैं, लेकिन रिहाइशी कॉलोनियों और कारखानों से निकलने वाले गंदे पानी को इसमें मिलने से रोकना मुमकिन नहीं हो पाया है। औद्योगिक इकाइयां जहां मुनाफे के चक्कर में कचरे के निस्तारण और परिशोधन के प्रति बिल्कुल भी संवेदनशील नहीं होतीं, वहीं राज्य सरकारें और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी कल-करखानों की मनमानियों के प्रति अपनी आंखें मूंदे रहती हैं। और तो और, न्यायपालिका के कठोर रुख के बाद भी राज्य सरकारें दोषी लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं करतीं। गंगा को साफ करने के लिए साल 1986 में शुरू हुई कार्ययोजना उसी वक्त परवान चढ़ गई होती, यदि इस पर गंभीरता से अमल किया गया होता। पांच सौ करोड़ रुपये की लागत से शुरू हुई इस योजना में बीते 15 सालों के दौरान तकरीबन नौ सौ करोड़ रुपये खर्च हो गए, लेकिन गंगा साफ होने की बजाय और भी प्रदूषित होती जा रही है। भ्रष्टाचार, प्रशासनिक उदासीनता और कर्मकांड मुल्क की सबसे पवित्र और बड़ी नदी को स्वच्छ बनाने की दिशा में रुकावट बने हुए हैं। गंगा में जहरीला पानी गिराने वाले कारखानों के खिलाफ कठोर कदम नहीं उठाए जाने का ही नतीजा है कि आज जीवनदायिनी गंगा का पानी कहीं-कहीं इतना जहरीला हो गया है कि इस जहरीले पानी से न सिर्फ पशु-पक्षियों के लिए संकट पैदा हो गया है, बल्कि आसपास के इलाकों का भूजल भी प्रदूषित होने से बड़े पैमाने पर लोग असाध्य बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। सदियों से हमारे देश के निवासी यह मानते आए हैं कि गंगा नदी का पानी कभी खराब नहीं होता। गंदगी मिलने पर भी यह खुद इसे शुद्ध कर लेती है। वैज्ञानिक तथ्यों की कसौटी पर यह धारणा एक हद तक सही भी है, लेकिन अब गंगा में चौतरफा से इतनी गंदगी आकर मिल रही है कि उसे खुद साफ कर पाना उसकी क्षमता से कहीं बाहर की बात हो गई है। गंगा में प्रदूषण का आलम यह है कि बरसात के मौसम में कानपुर और बनारस जैसे शहरों में गंगा नदी के बीचों-बीच बालू के बड़े-बड़े टीले उभर आते हैं। जिस बनारस में कभी गंगा का जलस्तर 197 फीट हुआ करता था, वहां लगातार प्रदूषण के चलते आज कई जगहों पर जलस्तर महज 33 फुट के करीब ही रह गया है। गंगा की धारा को निर्मल व अविरल बनाने के लिए आज गाद एक बड़ी समस्या बनी हुई है। प्रदूषण के अलावा गंगा नदी को इस पर बने हुए बांधों ने भी खूब नुकसान पहुंचाया है। अंग्रेजी हुकूमत ने साल 1916 में महामना मदनमोहन मालवीय के नेतृत्व में गंगाभक्तों के साथ समझौता किया था कि गंगा का प्रवाह कभी नहीं रोका जाएगा। आजाद हिंदुस्तान के संविधान की धारा 363 की भावना भी कमोबेश यही कहती है। बावजूद इसके टिहरी बांध से गंगा का प्रवाह रोका गया। अकेले टिहरी बांध ने ही गंगा को काफी नुकसान पहुंचाया है। अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक राज्य की तरक्की के लिए आने वाले समय में गंगा पर और भी बांध बनाना चाहते हैं। वे राज्य की हिमालयी नदियों से 10 हजार मेगावाट बिजली पैदा करना चाहते हैं। हालांकि तमाम बड़े-बड़े दावों के साथ बनाया गया टिहरी बांध आज भी अपने दावे के मुताबिक एक चौथाई बिजली तक नहीं बना पा रहा है। इसके विपरीत टिहरी बांध की वजह से गंगा का प्रवाह जरूर गड़बड़ा गया। असमंजस यह है कि बांध से लगे इलाके के 100 से भी ज्यादा गांवों में जहां पहले इफरात में पानी होता था, आज वह जल संकट से जूझ रहे हैं। किसान खेती को छोड़कर उसी दिल्ली की तरफ पलायन कर रहे हैं, जिसकी सुविधा के लिए यह बांध बनाया गया था। बहरहाल, गंगा नदी के संरक्षण की तमाम चुनौतियों के बावजूद उम्मीदें अब भी बाकी हैं। हर 10 में से चार भारतीय की प्यास बुझाने वाली गंगा को अब भी बचाया जा सकता है, लेकिन इसे बचाने के लिए सरकारी कोशिशों के अलावा व्यक्तिगत प्रयास भी जरूरी है। गंगा की सफाई के लिए भारी भरकम रकम खर्च करने से ज्यादा जरूरी है, हमारा जागरूक होना। जब तक हम जागरूक नहीं होंगे, तब तक गंगा स्वच्छ नहीं होगी। गंगा से हमने हमेशा लिया ही है, उसे दिया कुछ नहीं। गंगा से लेते वक्त हम यह भूल गए कि जिस दिन उसने देना बंद कर दिया या वह देने लायक नहीं रही, उस दिन हमारा और हमारी आने वाली पीढ़ी का क्या हश्र होगा।
Friday, June 3, 2011
Wednesday, June 1, 2011
जल विद्युत परियोजनाओं के नाम पर पहाड़ से खिलवाड़
हिमाचल प्रदेश में बिजली परियोजनाओं के नाम पर निजी कंपनियां और सरकारी तंत्र प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे हैं। नियम कायदों को दरकिनार कर पहाड़ों का मलबा नदियों के किनारे फेंका जा रहा है, जिससे तटीय क्षेत्र डंपिंग ग्राउंड में तब्दील होते जा रहे हैं। राज्य के उच्च पर्वतीय क्षेत्र किन्नौर की काशांग विद्युत परियोजनाओं के काम में जुटी कंपनियां और सरकारी तंत्र इसके लिए पूरी तरह से जिम्मेदार हैं। हिमाचल प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड काशांग स्टेज-एक के 65 मेगावाट प्रोजेक्ट के लिए लीज ही नहीं हुई है, लेकिन कार्य धड़ल्ले से चल रहा है। काशांग स्टेज-दो में किरंग खड्ड के पानी को छह किलोमीटर की भूमिगत सुरंग से काशांग में मिलाने की योजना है। काशांग स्टेज-तीन में किरंग खड्ड व काशांग के पानी को मिलाकर 195 मेगावाट विद्युत उत्पादन किया जाएगा। स्टेज-एक, दो, तीन व चार को पर्यावरण मंजूरी मिली है, लेकिन स्टेज दो, तीन व चार को न तो वन मंत्रालय से अभी तक स्वीकृति मिली है और न ही ग्राम सभाओं से अनापत्ति प्रमाणपत्र मिला है। इसके बावजूद एचपीसीएल अपने सब कांट्रेक्टर पटेल व एचसीसी कंपनी के माध्यम से मापदंडों को दाव पर रख कर कार्य कर रहा है। काशांग परियोजना का मलबा सतलुज नदी के सीने में फेंका जा रहा है। फील्ड जोन से दस मीटर ऊपर मलबा स्टोर करने के सभी नियम ताक पर रखे जा रहे हैं। कच्ची प्रोटेक्शन दीवारों से इसे रोकने का प्रयास किया जा रहा है। स्टेज दो व तीन का काम सुरंगों के माध्यम से शुरू कर दिया गया है जिसका ग्राम पंचायत रारंग, जंगी, लिप्पा व आसरांग के ग्रामीणों ने विरोध किया है। उन्होंने इस बारे में डीएम से लिखित शिकायत करने के साथ ही काम रोकने की मांग की है। उनका कहना है कि शुक्ला कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सात हजार फुट से ऊपर के क्षेत्रों में प्रोजेक्ट न बनाया जाए। मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है। साथ ही चेतावनी दी है कि काम न रोका गया तो आंदोलन किया जाएगा.
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