देश के किसी भी राज्य में वनभूमि पर अब पर्यटन सुविधाओं के विकास के नाम पर किसी भी प्रकार का नया निर्माण कार्य न होगा। यही नहीं, संरक्षित क्षेत्रों की सीमा से पांच किलोमीटर के दायरे में आने वाले इलाकों में पर्यटन से जुड़ी निजी क्षेत्र की गतिविधियों पर सेस लगाने की तैयारी है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा संरक्षित क्षेत्रों में इको टूरिज्म के नए दिशा निर्देश तो यही कहती है। पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश की ओर से संरक्षित क्षेत्रों में इकोटूरिज्म से संबंधित गाइडलाइन सभी राज्यों को जारी की गई है। इसके अनुसार, राज्य सरकारें 31 दिसंबर तक अपने यहां इकोटूरिज्म रणनीति तैयार करेंगे। हर राज्य में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में स्टेयरिंग कमेटी बनेगी, जो हर तीन माह में इको टूरिज्म की समीक्षा करेगी। गाइडलाइन में साफ कहा गया है कि संरक्षित क्षेत्रों में पहले ही बड़ी संख्या गेस्ट हाउस आदि हैं। इसलिए टूरिस्ट सुविधाओं के लिए कोई नया निर्माण न होगा। संरक्षित क्षेत्रों की सीमा से पांच किमी की परिधि में निजी क्षेत्र की जितनी भी पर्यटन संबंधी गतिविधियां चल रही हैं, उनसेकुल टर्न ओवर का पांच फीसदी हिस्सा लोकल कंजर्वेशन सेस के रूप में लिया जाएगा। संरक्षित क्षेत्रों में पर्यटकों से होने वाली आय को सरकार के खजाने की बजाए सुरक्षा, संरक्षण, आजीविका विकास से संबंधित गतिविधियों में खर्च करने की बात भी कही गई। अभी तक केरल, कर्नाटक, मध्य प्रदेश में ही ऐसी व्यवस्था है। केंद्र के दिशा-निर्देशों में वन विभाग को काफी ताकत दी गई है। पर्यटन योजनाओं और वन्यजीव संरक्षण के बीच विवाद की स्थिति में वन विभाग का मत लागू किया जाएगा। संरक्षित क्षेत्रों में इकोटूरिज्म की योजनाएं बनाने की जिम्मेदारी चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन को दी गई है, जो राज्य सरकार से अनुमोदन लेंगे। मंत्रालय ने राज्यों से इस गाइडलाइन पर 30 जून तक सुझाव भी मांगे हैं। इस सिलसिले में मंगलवार को वन सचिव समेत वन विभाग के अन्य आला अफसर इस पर मंथन करेंगे।
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Wednesday, June 29, 2011
Wednesday, February 23, 2011
गजराज के घर में वनराज का आशियाना
गजराजों (हाथियों) की रियासत राजाजी नेशनल पार्क में अब वनराज (बाघों) का आशियाना संवारने की भी तैयारी है। कोशिश है कि यहां भी वनराज विचरण कर सकें और उनके ठाठबाट में भी कोई कमी न रहे। यह खालिश घर तो नहीं, लेकिन घर सरीखा ही होगा। हालांकि अभी इसमें वक्त लगेगा, लेकिन प्रयास संपूर्ण वन्य जीवन की झलक दिखाने की उम्मीद जगा रहे हैं। आठ सौ बीस वर्ग किमी भूभाग में विस्तारित राजाजी नेशनल पार्क में गजराज के झुंड और इनकी चिंघाड़ सैलानियों को बरबस ही आकर्षित करती है, लेकिन यह पार्क गजराज ही नहीं, बाघों के लिए भी उत्तम पर्यावास वाला है। पार्क की चार रेंजों चीला, गौहरी, मोतीचूर व धौलखंड में बाघों की मौजूदगी इसे तस्दीक करती है। पार्क प्रशासन के मुताबिक वर्तमान में उक्त रेंजों में 10 से 12 बाघ मौजूद हैं। बाघ के लिए अनुकूल परिस्थितियों को देखते हुए पार्क प्रशासन ने अब प्रोजेक्ट टाइगर की तरह अपने यहां भी बाघों के संरक्षण पर फोकस करने का निश्चय किया है। पार्क के निदेशक एसएस रसाईली के अनुसार, पार्क की चार रेंजों में बाघों के लिए उचित पर्यावास है। लिहाजा, वहां भी टाइगर के हिसाब से उनका मैनेजमेंट होना चाहिए। इस सिलसिले में चारों रेंज का सर्वे कर राजाजी में बाघ संरक्षण को कदम उठाने के मद्देनजर प्रमुख वन संरक्षक वन्य जीव को प्रस्ताव भेजा गया है। मामले में उच्च स्तर पर ही विचार होना है। कोशिश रंग लाई तो आने वाले दिनों में गजराज के अधिपत्य वाले राजाजी पार्क में वनराज का घर भी संवरेगा। सैलानियों को गजराज के साथ ही वनराज के भी दर्शन होंगे, जो उन्हें जंगल की संपूर्णता का अहसास दिलाएंगे। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार बाघों के संरक्षण के प्रति बेहत सक्रिय है।
Monday, February 7, 2011
उत्तराखंड के जंगलों पर खतरा
खतरनाक वनस्पतियों की तिकड़ी का हमला
लैंटाना (कुर्री) के बाद अब बला (सीडाकार्डियो फोलिया), वासिंगा (गोगोस्टीमोन बैंगालीया) और वासुकि (एढाटोडा वासिका) जैसी वनस्पतियों न उत्तराखंड के जंगलों पर हमला बोला है। विश्व प्रसिद्ध जिम कार्बेट और राजाजी नेशनल पार्क इसके निशाने पर हैं। वन महकमा हैरान-परेशान है कि आखिर इस बला से कैसे निजात मिले। कोई युक्ति न सूझते देख महकमे की उम्मीद अब भारतीय वन्य जीव संस्थान पर जाकर टिक गई है। पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक लैंटाना जैसी वनस्पति कके हमले से उत्तराखंड के जंगल त्रस्त हैं। शायद ही कोई जंगल ऐसा होगा, जहां इसने पैर पसार पारिस्थितिकी के लिए खतरा पैदा न किया हो। कालाबांस व गाजरघास जैसी घातक वनस्पतियों ने भी मुसीबतें बढ़ाई हुई हैं। अब लैंटाना की तरह दूसरे पौधों को न पनपने देने वाली बला, वासिंगा व वासुकि जैसी वनस्पतियों ने सूबे के जंगलों पर हमला बोला है। हालांकि, पहले भी यह वनस्पतियां होती थीं, लेकिन अन्य के साथ। अब इनके पैचेज साफ दिखाई देने लगे हैं। कार्बेट में ढिकाला व झिरना और राजाजी में चीला, धौलखंड, कांसरो व रामगढ़ क्षेत्रों में खौफ की इस तिकड़ी की दस्तक अधिक देखने को मिली है। नतीजतन वन महकमे की पेशानी में बल पड़ गए हैं। वजह यह कि राजाजी में करीब 50 व कार्बेट में 45 फीसदी के आसपास हिस्से में लैंटाना का डेरा है और अब यह नई मुसीबत आ खड़ी हुई है। फिलहाल इससे निबटने का कोई रास्ता भी नहीं सूझ रहा। सो, विभाग ने भारतीय वन्य जीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) से मदद मांगी है। सूबे के चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन डॉ. श्रीकांत चंदोला के मुताबिक डब्ल्यूआइआइ से इस तिकड़ी का अध्ययन कराने को कहा गया है।
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