Wednesday, February 29, 2012

जहरीली हवा से हर साल तीन हजार मौतें


दिल्ली की हवा फिर से जहरीली हो चली है। प्रदूषण का जहर, शहर की हवा में तेजी से घुल रहा है। इसकी वजह से राजधानी में हर साल करीब तीन हजार मौतें हो रही हैं। शहर की हवा में पांव पसारता प्रदूषण का जहर कैंसर, हार्ट अटैक, सांस की बीमारियों सहित सेहत के लिए कई अन्य मुसीबतें खड़ी कर रहा है। इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव बच्चों पर हो रहा है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि शहर की 55 फीसदी आबादी इस वायु प्रदूषण की चपेट में है क्योंकि आबादी का यह हिस्सा मुख्य सड़कों के आसपास बसा हुआ है। दिल्ली सरकार को पेश की गई सेंटर फॉर साइंस एंड एनविरोनमेंट की एक रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है। इस रिपोर्ट में अमेरिका के हेल्थ इफेक्टस इंस्टीटयूट द्वारा टेरी के साथ मिलकर किए गए एक सर्वे के हवाले से बताया गया है कि दिल्ली में प्रतिवर्ष करीब एक लाख मौतें होती हैं जिनमें से तीन हजार मौतें वायु प्रदूषण के कारण होती हैं। सर्वे की यह रिपोर्ट वर्ष 2011 में प्रकाशित हुई थी। दस साल पहले दिल्ली सरकार ने डीजल के कारण बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए शहर में सीएनजी की शुरुआत की। तमाम बसें सीएनजी से चलाई जाने लगी। यहां कोयला से चलने वाले तीनों बिजली संयंत्र बंद कर दिए गए। प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को शहर से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इसके बावजूद वायु प्रदूषण में वृद्धि की वजह पूछने पर सेंटर फॉर साइंस एंड एनविरोनमेंट की अनुमिता राय चौधरी बताती हैं कि असली वजह यहां लगातार बढ़ रहे हैं वाहन हैं। इन्हीं की वजह से प्रदूषण बढ़ रहा है। उनका कहना है कि वाहनों पर लगाम लगाए बगैर वायु प्रदूषण को कम करना संभव नहीं होगा। दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग में तैनात आला अधिकारियों की राय में स्पो‌र्ट्स यूटिलिटी वैहकिल (एसयूवी) प्रदूषण को नए सिरे से हवा दे रहे हैं। इन बड़ी-बड़ी गाडि़यों से राजधानी की सेहत को खतरा हो रहा है। खुद मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी यह स्वीकार किया है कि वाहनों की बढ़ती संख्या दिल्ली के लिए मुसीबत साबित हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली की हवा में पार्टिकुलेट मैटर सबसे ज्यादा हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि चैन्नई, कोलकाता, मुंबई आदि शहरों में इसकी मात्रा में कमी आ रही है जबकि दिल्ली में यह बढ़ रहा है। एनओएक्स, एनओ2 तथा टीनियर पार्टिकल्स की मात्रा भी दिल्ली में बढ़ रही है। इन जहरीले पदार्थो की मात्रा आईटीओ चौराहा, पीतमपुरा, सिरी फोर्ट, शाहदरा तथा शाहजादा बाग में खतरनाक मात्रा में पाई गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि शहर में कार्बन मानोक्साइड की मात्रा में कमी आई है लेकिन सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर (पीएम10) समय पूर्व मौतों की प्रमुख वजह साबित हो रहा है। आर के पुरम तथा सिविल लाइन इलाके में पीएम 2.5 की मात्रा तय मानकों से कई गुना ज्यादा पाई गई है। बता दें कि दिल्ली में इस वक्त वाहनों की कुल संख्या 70 से 75 लाख के बीच है और प्रतिदिन यहां पर एक हजार से 1200 नए वाहन पंजीकृत होते हैं।

Wednesday, February 15, 2012

यूरोपीय संघ के खिलाफ तने भारत-चीन


यह ऐसी लड़ाई है, जिसे भारत और चीन पूरी एकजुटता से लड़ रहे हैं। मंगलवार को भी दोनों देशों ने पर्यावरण परिवर्तन के नाम पर लिए गए यूरोपीय संघ के एकतरफा फैसलों के खिलाफ खुल कर आवाज उठाई। साथ ही कहा है कि इस लड़ाई में उन्हें अपनी भूमिका का पूरी तरह ख्याल है। बेसिक देशों (भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील) के पर्यावरण मंत्रियों की यहां चल रही बैठक में पारित प्रस्ताव के तहत विकसित देशों के खिलाफ संघर्ष को जारी रखने का खुला संकेत दिया है। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि पर्यावरण परिवर्तन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय युद्ध में विकासशील देशों अपनी भूमिका को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। इन देशों ने अपने कदमों के जरिए लगातार इस बात को साबित भी किया है। पर्यावरण मंत्रियों ने कहा है कि विकसित देशों को भी अपनी एतिहासिक भूमिका को ध्यान में रखते हुए तुरंत सक्रियता दिखानी चाहिए। समानता के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए अपनी जवाबदेही पूरी करनी चाहिए। साझा बयान के मुताबिक विभिन्न देशों की क्षमता और एतिहासिक भूमिका के मुताबिक इस काम में उनकी हिस्सेदारी तय होनी चाहिए। यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन फॉर क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी पर्यावरण मंत्रियों ने यूरोपीय संघ के उत्सर्जन व्यापार योजना की भी जोरदार निंदा की है। बैठक में भाग ले रहे चीन के राष्ट्रीय विकास और सुधार आयोग के उपाध्यक्ष शिया जेनहुआ ने इसे पूरी तरह एकतरफा कदम बताया। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में इसका जोरदार विरोध होने के बावजूद यूरोपीय संघ ने इसे लागू कर दिया है। भारत की पर्यावरण राज्यमंत्री जयंती नटराजन ने भी उनके सुर से सुर मिलाते हुए कहा कि पर्यावरण परिवर्तन के नाम पर उठाया गया यह कदम पर्यावरण को ले कर अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को गंभीर नुकसान पहुंचाएगा। दो दिन चली इस बैठक की शुरुआत सोमवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की थी। बेसिक देशों के पर्यावरण मंत्रियों की अगली बैठक इस साल की दूसरी तिमाही में होगी और इसकी मेजबानी दक्षिण अफ्रीका करेगा।

Tuesday, February 14, 2012

सिमटते जंगल, विकराल होती मुसीबतें


पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित दिल्ली स्थायी विकास सम्मलेन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के जंगलों की स्थिति पर जो जानकारी दी थी, उसे उन्हीं की सरकार के एक मंत्रालय द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण ने गलत साबित कर दिया है। दरअसल, प्रधानमंत्री ने बताया था कि देश में वर्ष 1997 से वर्ष 2007 के बीच जंगलों की संख्या और क्षेत्र में पांच फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। प्रधानमंत्री ने उम्मीद भी जताई थी कि हरित मिशन के तहत जल्द ही 50 लाख हेक्टेयर भूमि पर वन क्षेत्रों का विकास कर लिया जाएगा। लेकिन पिछले दिनों वन सर्वेक्षण-2011 की जो रिपोर्ट आई है, वह प्रधानमंत्री के दावे को गलत साबित करती है। वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के वन क्षेत्रों में 367 किलोमीटर की कमी आई है और अब जंगल के कुल क्षेत्रफल का महज 23.81 प्रतिशत हिस्सा ही बचा हुआ है। सर्वेक्षण की यह ताजा रिपोर्ट बताती है कि सर्वाधिक आदिवासी इलाकों में वन्य क्षेत्र घटे हैं। यहां कुल 679 किलोमीटर वन्य भूमि कम हुई है। इसी तरह पहाड़ी इलाकों में 548 किलोमीटर वन्य क्षेत्र घटे हैं। सर्वेक्षण के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 3, आंध्र प्रदेश में 281, मणिपुर में 190 तथा नगालैंड में 146 किलोमीटर वन्य रकबा घटा है। दूसरी तरफ पंजाब में 100, झारखंड में 83, बिहार में 41, हरियाणा में 14, हिमाचल प्रदेश में 11 और जम्मू-कश्मीर में 2 किलोमीटर वन्य भूमि का विस्तार हुआ है। मणिपुर, नगालैंड, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश में वनों के रकबे में कमी का सर्वाधिक असर आदिवासियों और जंगली जानवरों पर पडे़गा। बहरहाल, पर्यावरण और जलवायु संकट के बीच वनों के क्षेत्रफल में गिरावट का सीधा असर हम इंसानों पर पड़ेगा। आज न सिर्फ भारत में वनों की संख्या और क्षेत्रफल में गिरावट आ रही है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी निरंतर जंगल घटते जा रहे हैं। पिछले दिनों दक्षिण अफ्रीका के डरबन में पर्यावरण सुरक्षा पर वैश्विक सम्मलेन के बीच ही संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट सामने आई थी। यह रिपोर्ट हमारी चिंताओं को और भी बढ़ाने वाली थी। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पूरे विश्व में हर साल औसतन 50 लाख हेक्टेयर वन्य क्षेत्र काटे जा रहे हैं। इससे अब धरती पर महज 30 प्रतिशत ही वन्य क्षेत्र बचा है। पर्यावरण संकट के बीच यह एक और दुर्भाग्य पूर्ण जानकारी है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई ने पर्यावरण असंतुलन का काम किया है। इससे न केवल पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हुई हैं, बल्कि वन्यजीवों का भी सफाया होता जा रहा है। ये वन्यजीव कई मायने में इंसान के हितैषी होते हैं, जिनका लुप्त होना इंसान के लिए खतरे की घंटी है। खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार, 1990 से 2005 के बीच पूरे विश्व में मौजूद करीब 7 करोड़ हेक्टेयर वन संपदा समाप्त हो चुकी है। यह वन्य संपदा देश के आर्थिक विकास में काफी मददगार होती है। कई जनजातियों की आजीविका भी सीधे वन्य संपदा से ही जुड़ी होती है। देश के जंगलों के बढ़ने-घटने का हिसाब रखने वाले फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार पिछले पांच सालों में भारत में बनने वाले बड़े बांधों और सुनामी के कहर से 728 वर्ग किलोमीटर जंगली क्षेत्र पूर्णत: नष्ट हो गया। सिर्फ 2003 और 2005 के बीच में ही 1409 वर्ग किलोमीटर जंगल क्षेत्र नष्ट हुआ था। एक समय जहां भारत में 50 प्रतिशत से भी अधिक जंगल थे, वहीं बाद में यह अपने सबसे निम्नतम स्तर यानी घटकर 20 प्रतिशत के आस-पास पहुंच गए। कटिबंधीय क्षेत्रों में सर्वाधिक जंगल काटे गए हैं और वहां अब कृषि योग्य भूमि विकसित कर दी गई है। भारत में वर्ष 1951 से 1972 के बीच 34 लाख हेक्टेयर वन्य क्षेत्रों को उद्योगों, बांधों, सड़कों आदि के लिए काटा गया। भारत में वनों को नष्ट करने की यह रफ्तार अब भी लगभग 10 लाख हेक्टेयर प्रतिवर्ष है। इस आंकड़े में उन वनों की कटाई का आंकड़ा नहीं है, जहां गैरकानूनी तरीके से वन काटे जा रहे हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई और इंसानों के बढ़ते दखल से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ा है। इसके साथ ही ओजोन परत का भी क्षय होता जा रहा है। ग्लोबल वॉर्मिग से हमारे कृषि उत्पादन भी घटते जा रहे है, जिससे खाद्य संकट की स्थिति पैदा हो गई है। चूंकि जंगल अचानक आने वाली बाढ़ों से मिट्टी के कटाव को रोकने में भी प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं, इस लिहाज से भी जंगल के संरक्षण की जरूरत है। हमने 1968 में तीस्ता, 1970 में अलकनंदा और 1978 में भागीरथी नदी की बाढ़ की विभीषिका को देखा है। इन सबके बावजूद हम उन मानवीय गलतियों से सबक नहीं लेते। हालांकि वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के प्रयास हो रहे हैं, लेकिन सबका ध्यान सिर्फ कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर ही है। किसी का ध्यान जंगल के संरक्षण की ओर नहीं जाता। जरूरी तो यह है कि पहले हम अपने वन्य क्षेत्रों समृद्ध और इनकी रक्षा करें। हालांकि जिस प्रकार देश में औद्योगिक तरक्की होती जा रही है और खाली भूमि का मिलना कम होता जा रहा है, ऐसी स्थिति में वनों का संरक्षण एक बड़ी चुनौती है। भारत में 1952 की वन नीति के तहत 33 प्रतिशत भूमि को वनों के अंतर्गत लाने की बात की गई थी, लेकिन 1951 से 1980 के दरम्यान बहुत कम प्रगति हुई। हरित की गई कुल 31.8 लाख हेक्टेयर भूमि में से केवल 6 लाख हेक्टेयर (लगभग 19 प्रतिशत) भूमि पर पौधे लगे। राष्ट्रीय नीति-1988 में क्षरित वनों की सुरक्षा और उनके प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भागीदारी का उद्देश्य सामने रखा गया था, लेकिन इसका भी उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं निकला। इस बीच मनरेगा और अन्य योजनाओं के जरिए वृक्षारोपण का अभियान चलाकर भारत सरकार एक सराहनीय पहल कर रही है, लेकिन पर्यावरण की समस्या इतनी विकराल हो चुकी है कि इस ओर वैश्विक स्तर पर मुहिम छेड़ने की जरूरत है। चंद देशों में वृक्षारोपण जैसे अभियान चलाकर समस्या का समाधान नहीं होने वाला। हमें तत्काल जंगलों की सुरक्षा के प्रति उचित रणनीतियां अपनानी होंगी। बढ़ते पारिस्थितिकी असंतुलन के प्रति भी हमें ध्यान देना होगा और इसके लिए हमें वैश्विक स्तर पर पहल करनी होगी। सीमित स्वार्थो को तिलांजलि देकर पूरे विश्व के सामाजिक और पर्यावरणीय हितों को सर्वोपरि रखना होगा। जंगलों के काटे जाने का प्रमुख कारण है विकास और व्यावसायिक हितों के लिए किए जा रहे कार्य। उदाहरण के तौर पर देखें तो हिमाचल प्रदेश सरकार अपने कुल राजस्व का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा करीब दो लाख वृक्षों की आहुति देकर हासिल करती है। साथ ही चीड़ के वृक्ष से रस निकालने का सिलसिला भी इसे खत्म कर रहा है। आर्थिक विकास के बीच अगर हम इसी रफ्तार से अपने आसपास के हरे वृक्षों और जंगल को नष्ट करते रहे तो इंसान का अस्तित्व खतरे में पड़ना स्वाभाविक है। लिहाजा, हमें ग्रीन ग्रोथ की ओर बढ़ना होगा। यानी ऐसी तरक्की, जहां हरियाली का नाश न हो और विकास की रफ्तार भी बनी रहे। साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का जितना प्रयोग किया जाए, उसकी भरपाई भी सुनिश्चित की जाए। अगर किसी कारण से कोई हरा पेड़ काटना पड़े तो इसकी भरपाई तभी हो सकती है, जब हम तीन-चार पौधे लगाएं। जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले 15 वर्षो के दौरान नए शहरों के निर्माण और विकास के नाम पर प्रत्येक मिनट 9.3 हेक्टेयर क्षेत्र के वन उजाड़े गए हैं, इस तरह क्या हमने प्रकृति से आफत नहीं मोल ली है? वास्तव में हम जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को काट रहे हैं। अब भी वक्त है। अगर हम नहीं चेते और जंगलों का खात्मा ऐसे ही होता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मानव जीवन खतरे में पड़ जाएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Wednesday, December 28, 2011

डरबन के बाद की चुनौतियां


डरबन में जुटे दुनिया भर के राजनेताओं, पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के लिए पिघलते हुए ग्लेशियर, उफनते समुद्र, बदलते मौसम और गर्म होती धरती जहां चिन्ता का विषय थे वहीं विकसित दुनिया की राजनीति पूरी तरह अपने हितों को साधने की कूटनीतिक चालों में व्यस्त थी। अन्ततोगत्वा इस नीले ग्रह को बचाने पर जीत पूंजी संचय के कूटनीतिक इरादों की हुई। जलवायु परिवर्तन पर कई दिनों तक चली डरबन वार्ता असफलताओं पर सहमति वार्ता सिद्ध हुई। अमेरिका के नेतृत्व में विकसित देशों की कार्बन उत्सर्जन को थामने की वैधानिक बाध्यता बनने से रोकने की कोशिश कोई नई व पहली नहीं थी। दिसम्बर 1997 में जापान के क्योटो शहर में 150 देशों के प्रतिनिधियों ने एकत्र होकर एक प्रोटोकॉल तैयार किया जिसे क्योटो प्रोटोकॉल नाम से जाना जाता है। यह प्रोटोकॉल विकसित, औद्योगिक और कुछ मध्य यूरोपीय देशों को 2012 तक 1990 के स्तर से 6 से 8 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन घटाने की कानूनी बाध्यता बनाता था। इसको कानून बनाने के लिए 55 प्रतिशत औद्योगिक देशों के अनुमोदन की आवश्यकता थी परन्तु अमेरिका सहित कनाडा, जापान और आस्ट्रेलिया सरीखे उसके तमाम सहयोगी देशों ने क्योटो प्रोटोकॉल के कानून बनने से रोकने के लिए रुकावटबाजों की भूमिका अदा की। तीन महीने की लम्बी बहस के बाद 2002 में कनाडा और फरवरी 2005 में रूसी अनुमोदन के बाद ही क्योटो प्रोटोकॉल कानूनी रूप ले सका। दुनिया बेशक तेजी से मानव निर्मित विनाश की और बढ़ रही हो मगर विकास के वकीलों के अपने तर्क और योजनाएं हैं, जिनके लिए वो दुनिया को धमकाना भी जानते हैं और ब्लैकमेल करना भी और यही योजनाएं वर्तमान विकास के पैरोकारो ने कोपेनहेगन से शुरू की जो डरबन तक आते-आते अपने निर्णायक मुकाम पर पंहुच गई। यदि क्योटो प्रोटोकॉल का दूसरा फेज कोपेनहेगेन में तैयार हो जाता तो 2050 तक पृथ्वी के बढ़ते तापमान को दो डिग्री की सीमा में रखने के लिए कम से कम पचास प्रतिशत की कटौती आवश्यक होती एवं औद्यागिक देशों के लिए यह कटौती अस्सी प्रतिशत तक होती। दुनिया के पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के लिए कोपेनहेगन समिट का एजेन्डा जहां दूसरे क्योटो प्रोटोकॉल का रोडमेप तैयार करना प्राथमिकता थी, वहीं पहले क्योटो प्रोटोकॉल के रुकावटबाजों के लिए दूसरे प्रोटोकॉल को रोकना प्राथमिकता थी। कोपेनहेगन से शुरू हुई औद्योगिक देशों की इस योजना का अगला पड़ाव जहां कानकुन था वहीं डरबन में दुनिया के रुकावटबाज पूरी तरह कामयाब हो गए। ब्रिक देशों को सौ बिलियन डॉलर के मुआवजे का आासन देकर विकसित देशों ने तीसरी दुनिया के देशों को दो हिस्से में विभाजित कर दिया- अल्पविकसित और द्वीपीय देए एवं विकासशील देश। दरअसल कोपेनहेगन जलवायु सम्मेलन में अमेरिका की यही सबसे बडी जीत थी जिसकी गूंज डरबन में सुनाई दी जब ग्रेनाडा के प्रतिनिधि ने कहा कि आप बस बहस कर रहे हैं जबकि हम लोग मर रहे हैं। वास्तव में अल्पविकसित एवं द्वीपीय देशों की यही विडम्बना है कि वो उस दोष की सजा भुगत रहे हैं जिसे करने के वो आज तक काबिल नहीं हो पाए हैं दूसरी तरफ विकासशील देश जब विकास की राह पर तेजी से बढ़ रहे हैं तो पर्यावरण बचाव के नाम पर उनकी राह में अवरोध खड़े किए जा रहे हैं। दरअसल कोपेनहेगन से शुरू हुआ विफलताओं का यह समझौता चक्र गरीबों की जिंदगी पर अमीर दुनिया की सुविधाओं की जीत है। क्योटो प्रोटोकॉल सरीखे बाध्यकारी प्रावधान 2012 तक तैयार हो जाते तो दुनिया में कार्बन उत्सर्जन को एक सीमा में बांधकर बिगड़ते पर्यावरण को बचाने के लिए प्रभावकारी काम किया जा सकता था। अब यह बाध्यकारी प्रावधान तैयार करने के लिए 2015 की समय सीमा तय की गई है और यदि यह तैयार हो गए तो वह 2020 से लागू होना शुरू हो जाएंगे परन्तु यदि कार्बन उत्सर्जन इसी गति से बढ़ता रहा तो 2020 तक ग्लोबल वार्मिंग का स्तर वर्तमान समय से तीन गुना अधिक बढ़ चुका होगा। मानव निर्मित तबाही के लिए जिम्मेदार देश आज अपने हाथों रचे इस भयावह खतरे को बेशक अनदेखा करना चाहते हैं मगर इसका खमियाजा उन द्वीपीय और गरीब देशों को भुगतना पड़ रहा है जो ग्लोबल वार्मिंग से उत्पन्न खतरों को लगातार झेल रहे हैं और उनसे निपटने लायक संसाधन भी उनके पास नही हैं। हालांकि जलवायु परिवर्तन नियंत्रित करने के लिए बने क्योटो प्रोटोकॉल की बाध्यता 2012 के अन्त में समाप्त हो जाएगी परन्तु जैसी भावना और दुनिया की संभावित बर्बादी के प्रति लापरवाही का रवैया विकसित देशों ने जाहिर किया है, उससे 2015 तक भी किसी नए बाध्यकारी प्रावधानों की संभावना नजर नहीं आती। विकसित देशों ने जैसी मंशा डरबन में जाहिर की है, उससे पर्यावरण बचाने की चुनौती और गंभीर होती नजर आती है। बहरहाल अगले समिट में दुनिया साफतौर पर तीन खेमों में बंटी होगी और अमेरिका एवं उसके सहयोगी देश ऐसी स्थिति का फायदा अपने हितों को साधने के लिए उठाने के लिए पूरी कोशिश करेगें।

Friday, December 16, 2011

डरबन में बंधी नई उम्मीद

जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने के मुद्दे पर आयोजित वार्ता सम्मेलन समाप्त हो चुका है। यह सत्रहवां मौका था जब जलवायु परिवर्तन के खतरों के मद्देनजर दुनिया के देश कार्बन उत्सर्जन पर चर्चा के लिए डरबन में जुटे थे। मुद्दा जहां का तहां था कि कैसे जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम किया जाए। करीब 20 साल पहले 1992 में युनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कंवेन्शन ऑन क्लाइमेट चेंज बना था। तभी से जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपायों पर चर्चा शुरू हुई। तब से डरबन वार्ता तक जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए 17 बैठकें संपन्न हो गई हैं लेकिन अब तक पर्यावरण प्रदूषण के खतरों से निपटने के लिए किसी ठोस रणनीति पर क्रियान्वयन शुरू नहीं हो पाया है। जितना भी कार्य हुआ है, वह केवल नीतिगत स्तर पर हुआ है और उसका जमीनी धरातल पर उतरना बाकी है। जलवायु वार्ताओं में दो शब्दों का प्रमुखता से इस्तेमाल होता रहा है। ये हैं- मिटिगेशन और ऐडेप्टेशन। मिटिगेशन का मतलब उन गैसों के उत्सर्जन में कटौती से है, जिनकी वजह से धरती गर्म हो रही है। एडेप्टेशन का मतलब ऐसे उपायों से है, जिनसे जलवायु संकट का असर कम किया जा सके। क्योटो प्रोटोकॉल के दूसरे चरण को ताक पर रखने के साथ हालांकि मिटिगेशन की बात एक तरह से ठंडे बस्ते में डाल दी गई है पर डरबन में बातचीत के दौरान कुछ निर्णय जरूर लिए गए जिन्हें डरबन प्लेटफार्म नाम दिया गया। इसमें भविष्य में एक समझौते पर चर्चा की बात कही गई है जिसमें कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए अधिक आक्रामक लक्ष्य तय किए जाएंगे ताकि दुनिया के औसतन तापमान में होने वाले इजाफे को दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित किया जा सके। बहस थी कि समझौता कानूनी रूप से सभी देशों पर बाध्यकारी होगा या नहीं? भारत समझौते की कानूनी बाध्यता का विरोध कर रहा था और उसे हाशिए पर डाल दिया गया। पश्चिमी मीडिया ने भारत को ऐसे देश के रूप में दर्शाया जो समझौता तोड़ने की कोशिश कर रहा था या जो प्रदूषण फैलाने का अधिकार मांग रहा है। वास्तव में यूरोपीय यूनियन दुनिया का ध्यान अपनी वादा खिलाफी से हटा इस मौके का फायदा उठाना चाहती थी। इससे पूर्व इन देशों ने क्योटो घोषणा के तहत वादा किया था कि वे वातावरण पर दुष्प्रभाव डालने वाली गैसों पर तय सीमा के अन्दर रोक लगाएंगे लेकिन डरबन सम्मेलन में इन्होंने सुर बदलते हुए ऐसी नई संधि की मांग कर डाली जो पूरी दूनिया पर समान रूप से लागू हो। भारत ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि पहले क्योटो घोषणा से बंधे अमीर मुल्क यह बतायें कि उन्होंने अपने वादे किस हद तक पूरे किये। सब जानते हैं कि कार्बन उत्सर्जन में सबसे ज्यादा योगदान विकसित देशों का है, मगर वे कटौती नहीं करना चाहते। क्योटो प्रोटोकाल पर उनका मनमाना रवैया रहा है। अमेरिका जैसे दुनिया के दूसरे सबसे बड़े उत्सर्जक और मुखिया ने इस पर हस्ताक्षर ही नहीं किये हैं। 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल के मुताबिक 2012 तक विकसित देशों को कार्बन उत्सर्जन में 1990 के स्तर से पांच फीसद तक की कटौती करनी है, जबकि भारत और चीन जैसे देशों के लिए ऐसी बाध्यता नहीं है। पश्चिमी देश इसे पचा नहीं पा रहे हैं क्योंकि चीन और भारत की अथव्यवस्था तेजी से बढ़ रही हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि चीन कुछ ही सालों में अमेरिका को पीछे छोड़ देगा। खैर, डरबन में संपन्न जलवायु सम्मेलन में भारत और यूरोपीय संघ के बीच जारी गतिरोधों के बावजूद अंतिम समय में सहमति बन गई। अन्यथा कोपेनहेगन से जलवायु वार्ता ने जो मोड़ लिया था, डरबन वार्ता भी उसी मुकाम के करीब पहुंचती दिख रही थी पर अंतिम समय में भारत और यूरोपीय संघ ने गतिरोध खत्म करते हुए इसे नये मुकाम पर पहुंचा दिया। शिखर सम्मेलन के समापन सत्र में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन का भाषण प्रभावशाली रहा। उन्होंने चेतावनी दी कि भारत किसी भी खतरे या दबाव के आगे नहीं झुकेगा। सुश्री नटराजन ने कहा कि क्या जलवायु परिवर्तन से लड़ने का अर्थ यह है कि हम निष्पक्षता के सवाल पर घुटने टेक दें? पर भारत किसी भी खतरे या दबाव के आगे नहीं झुकेगा। कुछ देशों ने यूरोपीय संघ का समर्थन किया, लेकिन चीन ने भारत का मजबूती से समर्थन किया। आखिरकार 2015 के लिए एक संतुलित समझौते की रूपरेखा मंजूर कर ली गई । इस समझौते के तहत भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन करने वाले सभी देश उत्सर्जन में कटौती के लिए पहली बार कानूनी तौर पर बाध्य होगें। इसके तहत पहली बार भारत और चीन भी उत्सर्जन कटौती के दायरे में आएंगे। साथ ही नए करार के तहत सभी देश एक समान कानूनी व्यवस्था में आएंगे। सम्मेलन में इस वार्ता की गति तेज करने पर भी सहमति बनी। कहा गया कि यह काम वर्ष 2015 तक कर लिया जाना चाहिए ताकि इस नए समझौते को कम से कम वर्ष 2020 तक लागू किया जा सके। इसके साथ डरबन बैठक में क्योटो प्रोटोकॉल के लिए दूसरी प्रतिबद्धता अवधि के लिए सहमति जताई गई है जो विकासशील देशों की अत्यंत पुरानी मांग है। इस सम्मेलन की तीसरी बड़ी उपलब्धि रही ग्रीन क्लाइमेड फंड की स्थापना ताकि संवेदनशील मुल्कों को उत्सर्जन में कमी के बदले भुगतान किया जा सके। लेकिन इस फंड में कोई पैसा है ही नहीं। दरअसल विकसित देशों का कहना है कि मंदी के चलते फिलहाल वे किसी तरह के भुगतान की स्थिति में नहीं है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि इस जरूरी हस्तांतरण का भुगतान करने के लिए धन जुटाने के लिए किन नए तरीकों का इस्तेमाल किया जाए। याद रहे कि कोपेनहेगन में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने गरीब और जलवायु परिवर्तन की वजह से खतरे में पड़ रहे देशों की मदद की खातिर 2020 तक के लिए सौ अरब डॉलर का हरित कोष तैयार करने का ऐलान किया था। लेकिन न वहां और न कानकुन में यह तय हो सका कि इसमें कौन सा देश कितनी रकम देगा और कब देगा और उस रकम से मदद देने का तरीका क्या होगा? कानकुन में बस एक बात यह उभर कर सामने आई कि यह मदद यूएनएफसीसीसी के जरिए ही दी जाएगी। अत: डरबन जलवायु सम्मेलन एक महत्वपूर्ण बदलाव का बिंदु है। इस सम्मेलन में समता के मसले पर दोबारा जोर दिया गया ल्ेकिन इस बिंदु पर अमीर देशों का खुला प्रतिरोध भी देखने को मिला। अब यह एक खुली लड़ाई है। अब यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि दक्षिण अफ्रीका की मेजबानी में संपन्न डरबन प्लेटफार्म जलवायु संकट से निपटने की दिशा में गहराते भेदभाव को और गहरा न कर दे।

Wednesday, December 14, 2011

शुक्र है, क्योटो जैसा हश्र नहीं हुआ


काफी जद्दोजहद के बाद आखिरकार संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता एक मुकाम तक पहुंच ही गई। जलवायु वार्ता के आखिरी दिन एक समझौता हुआ, जिस पर सभी देशों ने अपनी सहमति व्यक्त की। समझौते के तहत विकसित देश अब क्योटो प्रोटोकॉल के तहत 2013 से अपने उत्सर्जन में कटौती करने को राजी हो गए हैं। नए करार के तहत अब सभी देश एक ही कानूनी व्यवस्था में आएंगे। इस कानूनी समझौते पर वार्ता अगले साल शुरू होगी और 2015 तक समाप्त हो जाएगी, जिसके बाद वर्ष 2020 में नया करार पूरी दुनिया में प्रभावी हो जाएगा। यानी शुरुआती ना-नुकुर के बाद विकसित देशों ने विकासशील देशों की इस मांग को मान लिया है कि पहले वे अपने यहां उत्सर्जन कम करें। डरबन सम्मेलन की खास उपलब्धि यह रही कि क्योटो संधि से शुरू से ही बाहर रहने वाले अमेरिका ने भी इस करार का समर्थन किया। गौरतलब है कि क्योटो प्रोटोकॉल कानूनी रूप से ऐसा अकेला नियामक है, जो अमीर देशों को कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए बाध्य और भविष्य के एक प्रभावी करार की दिशा में मार्ग प्रशस्त करता है। ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय करार क्योटो प्रोटोकॉल, जो साल 2004 से अमल में आया, इस समझौते में यह तय हुआ था कि 37 विकसित मुल्क स्वैच्छिक कटौती के तहत आहिस्ता-आहिस्ता अपने यहां साल 2012 तक 4 ग्रीन हाउस गैस और 2 दीगर खतरनाक गैसों का प्रदूषण 1990 के स्तर पर 6 फीसदी घटा देंगे, लेकिन हकीकत यह है कि कई देशों ने उस समय किए गए वादों को बिल्कुल भी नहीं निभाया। जापान, कनाडा, रूस, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका अपने वादे से पूरी तरह मुकर गए, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो हवा में कार्बन डाईऑक्साईड घोलने में अकेला अमेरिका 26 फीसदी का हिस्सेदार है। एक आकलन के मुताबिक भारत द्वारा उत्सर्जित ग्रीन हाउस गैसों के बरक्स अमेरिका दस गुना अधिक गैस वातावरण में उगलता है। प्रति व्यक्ति स्तर पर नापा जाए तो यह अनुपात और भी खतरनाक है। मसलन, औसत भारतीय की बनिस्बत औसत अमेरिकी 20 गुना से ज्यादा ऊर्जा का उपभोग करता है। जाहिर है, यही वह वजह है जिससे वातावरण में कहीं ज्यादा ग्रीन हाउस गैसें घुलती हैं। अमेरिका और तमाम विकसित देश जो सभी देशों को एक डंडे से हांकना चाहते हैं, उनसे क्या यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि भारत और बाकी विकासशील देशों को विकास के उस स्तर तक पहुंचने का क्या कोई हक नहीं है, जहां अमीर देश पहले ही पहुंच चुके हैं? जहां तक डरबन सम्मेलन में हमारे देश की भूमिका का सवाल है, कानकुन सम्मेलन की तरह इस सम्मेलन में भी भारत ने अपनी बात जोरदार तरीके से रखी। जलवायु सम्मेलन में भारत ने जोर देकर कहा कि जलवायु से जुड़ी वार्ताओं का केंद्र समानता होनी चाहिए। पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने सम्मेलन में भारत का पक्ष रखते हुए कहा, वह साल 2020 के बाद ही क्योटो करार जैसी नई संधि का हिस्सा बनने पर विचार करेगा, लेकिन इससे पहले विकसित देश अपना उत्सर्जन कम करें और विकासशील देशों को इसके लिए वित्तीय मदद और प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराने की मौलिक प्रतिबद्धता का पालन करें। इस मामले में विकासशील और छोटे देशों की समानता, व्यापार में बाधक और बौद्धिक संपदा से जुड़ी चिंताओं का भी समाधान किया जाए। भारत के इस रुख पर यूरोपीय संघ हालांकि पहले नाराज हुआ, लेकिन बाद में उसने भी यह बातें मान लीं। डरबन सम्मेलन में एक अच्छी बात यह हुई कि पहली बार बेसिक समूह के देश मसलन ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन एक साथ खड़े नजर आए। यहां तक कि भारत के पक्ष का उसके मुख्य प्रतिद्वंद्वी देश चीन ने भी समर्थन किया। कुल मिलाकर क्योटो जलवायु सम्मेलन के बाद डरबन सम्मेलन ऐसा दूसरा सम्मेलन है, जिसमें सभी देश एक समझौते पर एक राय हुए। सभी देशों ने इस बात पर रजामंदी जताई कि साल 2020 से वे अपने यहां कार्बन उत्सर्जन में कमी लाएंगे। जाहिर है, डरबन सम्मेलन की यह सबसे बड़ी कामयाबी है। दुनिया को बढ़ते तापमान के खतरे से बचाने के लिए यह समझौता लाजिमी भी था। क्योटो प्रोटोकाल को आगे बढ़ाने और उत्सर्जन कटौती का लक्ष्य तय नहीं करने का मतलब सीधे-सीधे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना होता। दुनिया और समूची इंसानी बिरादरी को बचाने के लिए जरूरी है कि आगामी सालों में डरबन समझौते को ईमानदारी से अमल में लाया जाए। वरना, बहुत देर हो जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)