Monday, April 23, 2012

यमुना की सफाई की सभी योजनाएं फेल


सरकार के गले की हड्डी बनी सीएजी ने अबकी बार यमुना सफाई की परियोजनाओं में सरकार को फेल घोषित कर दिया है। भारत के नियंत्रक व महा लेखा परीक्षक यानी सीएजी ने बड़े ही साफ शब्दों में सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में यमुना नदी में प्रदूषण रोकने के लिए चलाई जा रही सभी परियोजनाएं नाकाम हैं। वे नदी में प्रदूषण नियंत्रण काउद्देश्य पूरा नहीं कर रही हैं। इसके जवाब में केंद्र सरकार ने यमुना सफाई के लिए 19 वर्षों से की जा रही कवायद और 1306 करोड़ के खर्च का ब्योरा देते हुए कहा है कि जून 2012 तक यमुना एक्शन प्लान का दूसरा चरण भी पूरा हो जाएगा। हालांकि परियोजनाओं को लागू करने और नदी को प्रदूषण मुक्त करने की सारी जिम्मेदारी केंद्र ने राज्यों और स्थानीय एजेंसियों के सिर डाल दी है। यानि 19 साल, 13 सौ करोड़ और नतीजा शून्य। सीएजी और केंद्र सरकार ने ये बात यमुना सफाई पर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने ताजा हलफनामे में कही हैं। कोर्ट के गत 27 फरवरी के आदेश का पालन करते हुए केंद्र सरकार, सीएजी और कुछ राज्य सरकारों ने हलफनामे दाखिल किये हैं। सुप्रीम कोर्ट पिछले 18 वर्षों से यमुना को प्रदूषण मुक्त करने की निगरानी कर रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार का हलफनामा तो परियोजनाओं की अप टू डेट रिपोर्ट पेश करता है। जबकि सीएजी ने उन्हें नाकाम बताया है। सीएजी ने अपनी वर्ष 2000 की रिपोर्ट से लेकर 2011 -12 की भारत में जल प्रदूषण की रिपोर्ट तक का ब्योरा दिया है जो बताता है कि कुछ भी ठीक नहीं है। हलफनामे के साथ रिपोर्ट के अंश संलग्न किए गये हैं। सीएजी ने कहा है कि 2011-12 में जल प्रदूषण के परफार्मेंस आडिट (प्रदर्शन आंकलन) के मुताबिक दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में चल रही परियोजनाएं यमुना में प्रदूषण रोकने के उद्देश्य को पूरा नहीं कर रही हैं। इससे पहले वर्ष 2000 में गंगा एक्शन प्लान के आडिट में सीएजी ने यमुना एक्शन प्लान की परियोजनाओं का भी आकलन किया था उस समय भी तीनों राज्यों की यही स्थिति थी। 2004 में सीएजी ने दिल्ली में यमुना की स्थिति का आंकलन किया। इस रिपोर्ट में यमुना की हालत गंभीर बताई गयी थी। 2011-12 की रिपोर्ट में सीएजी ने उत्तर प्रदेश में कानपुर, गाजियाबाद और लखनऊ की परियोजनाओं को फेल बताया है और गोमती, गंगा व हिंडन के पानी को बीमारियों का घर कहा है।

गंगा का गंभीर संकट


गंगा का अस्तित्व खतरे में है। वह भारतीय जन-गण-मन की आस्था, अध्यात्म व कृषि अर्थव्यवस्था की माता है। वह भारत का सांस्कृतिक प्रवाह है। दर्शन, भक्ति, योग और ज्ञान-विज्ञान का ढेर सारा सृजन गंगा के तट पर हुआ। वह मुक्तिदायिनी है, लेकिन वोटदायिनी नहीं। सो राजनीतिक एजेंडे से बाहर है। 861404 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत गंगा क्षेत्र-बेसिन भारत की सभी नदियों के क्षेत्र से बड़ा है और दुनिया की नदियों में चौथा। 2525 किलोमीटर लंबा यह क्षेत्र देश के पांच राज्यों-उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल तक फैला हुआ है। गंगा तट पर सौ से ज्यादा आधुनिक नगर और हजारों गांव हैं। देश की लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या गंगा क्षेत्र में रहती है। देश का 47 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र गंगा बेसिन में है। पेयजल, सिंचाई का पानी और आस्था स्नान में गंगा की अपरिहार्यता है, लेकिन यही गंगा तमाम बांधों, तटवर्ती नगरों के सीवेज और औद्योगिक कचरे को ढोने के कारण मरणासन्न है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गंगा बेसिन प्राधिकरण की बैठक में गंगा में रोजाना गिरने वाले 29,000 लाख लीटर कचरे पर चिंता व्यक्त की और कहा कि गंगा को बचाने का समय हाथ से निकल रहा है, लेकिन उन्होंने समय के सदुपयोग में सरकारी इच्छाशक्ति का कोई विवरण नहीं दिया। देश निराश हुआ है। प्रधानमंत्री बिना वजह ही समय का रोना रोते हैं। गंगा के जीवन मरण का प्रश्न अभी ही नहीं उठा। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भी ऐसे ही सवाल उठे थे। उन्होंने 1979 में केंद्रीय जल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सर्वेक्षण का काम सौंपा था। उनके बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी की अध्यक्षता में फरवरी 1985 में केंद्रीय गंगा प्राधिकरण बना। 350 करोड़ के बजट प्रावधान थे। 14 जनवरी, 1986 को वाराणसी में गंगा एक्शन प्लान की घोषणा हुई। गंगा एक्शन प्लान (पहला चरण) 1990 तक पूरा करने की योजना थी। इसका समय 2001-2008 तक बढ़ाया गया। संसद की लोकलेखा समिति (2006) की रिपोर्ट में सरकारी कामकाज पर चिंता व्यक्त की गई। उत्तर प्रदेश और बिहार की अनेक योजनाएं अधूरी रहीं। गंगा एक्शन प्लान (दूसरा चरण) के लिए 615 करोड़ की स्वीकृतियां हुईं, 270 परियोजनाएं बनीं। उत्तर प्रदेश में 43 व पश्चिम बंगाल में 170 परियोजनाएं थीं। इसी तरह उत्तरांचल में 37 परियोजनाएं थीं। कुछ ही पूरी हुईं। भ्रष्टाचार व सरकारी तंत्र की ढिलाई से गंगा एक्शन प्लान फ्लॉप हो गया। गंगा असाधारण वरीयता का विषय है। अविरल और निर्मल गंगा राष्ट्र जीवन से जुड़ी असाधारण नदी है। गंगा को लेकर तमाम आंदोलन चले, आज भी चल रहे हैं। केंद्र इन्हें कर्मकांड की तरह लेता है, राज्य सरकारें भी इन्हें महत्व नहीं देतीं। अधिकांश आंदोलनकारी संगठन भी कोई प्रभाव नहीं डालते। राजनीतिक दलतंत्र वोट के हिसाब से सक्रिय होता है। व्यवस्था विनम्र आंदोलनों की अनदेखी करती है। कोई 14 बरस पहले एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने दुनिया की दस बड़ी नदियों के साथ गंगा के अस्तित्व को भी खतरा बताया था। प्रधानमंत्री को आज समय की कमी दिखाई पड़ रही है। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण 20 फरवरी, 2009 में बना था। 24 सदस्यीय इस प्राधिकरण के अध्यक्ष स्वयं प्रधानमंत्री ही हैं। पर्यावरण, वित्त, नगर विकास, जल संसाधन, ऊर्जा, विज्ञान विभागों के केंद्रीय मंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष व गंगा प्रवाह वाले पांच राज्यों के मुख्यमंत्री इसके सदस्य हैं। आठ प्रमुख सदस्य अपने-अपने क्षेत्रों के प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता हैं। विश्व बैंक धन और तकनीकी ज्ञान की सहायता देने को तत्पर है। मूलभूत प्रश्न है कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले इस महाशक्तिशाली गंगा बेसिन प्राधिकरण ने चार साल में कुल जमा तीन बैठकों के अलावा क्या प्रगति की? क्या प्रधानमंत्री द्वारा समय की कमी बताना ही बैठक का मुख्य एजेंडा था? गंगा का संकट भारत की नई सभ्यता का संकट है। यह संस्कृतिविहीन राजनीति का भी संकट है। गंगा रुग्ण है, प्रतिपल मर रही है। यूरोप की टेम्स, राइन और डेन्यूब भी प्रदूषण का शिकार थीं। यूरोपवासियों ने उनके पर्यावरणीय महत्व को सर्वोपरिता दी। प्रदूषित नदियां राष्ट्रीय चिंता बनीं, सरकारों ने ठोस कार्यक्रम बनाए। नदियां प्रदूषण मुक्त हो गईं। हमारी गंगा न अविरल है, न जलमग्न और न ही निर्मल। गंगा बेसिन प्राधिकरण की बैठक में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने गंगा का नहीं, बांधों का महत्व समझाया। गोमुख से लेकर ऋषिकेश और हरिद्वार में ही अविरल गंगाजल का अभाव है। उत्तर प्रदेश की गंगा में महानगरीय कचरा है। यमुना दिल्ली आदि नगरों का कचरा प्रयाग में मिलाती है। प्रयाग में अब औद्योगिक कचरे का संगम है। आगे पश्चिम बंगाल तक यही स्थिति है। प्रधानमंत्री की मानें तो राज्य सरकारें ही समुचित प्रस्ताव व प्रदूषणकारी उद्योगों के खिलाफ ठोस कार्रवाई न करने की गुनहगार हैं। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नाकाम है। सवाल यह है कि राज्य सरकारें अपना कर्तव्य पालन क्यों नहीं करतीं? उद्योगों को ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के लिए बाध्य क्यों नहीं करतीं? नगर निकायों से सीवेज योजनाओं के प्रस्ताव क्यों नहीं लिए जाते? कानपुर नगर निगम ने गंगा के किनारे दूषित जल निस्तारण संग्रहण और ट्रीटमेंट का सुझाव बहुत पहले ही शासन को भेजा था, लेकिन सरकारें नगर निकायों के प्रस्तावों पर गौर नहीं करतीं। सीवेज ट्रीटमेंट पर तेज रफ्तार काम करते हुए गंगा, यमुना आदि में कचरा और गंदगी को डालने से रोका जा सकता है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले गंगा बेसिन प्राधिकरण की तर्ज पर राज्यों में भी मुख्यमंत्री की अध्यक्षता और गंगा तटवर्ती सभी नगरों के प्रमुखों, महापौरों की सदस्यता वाले प्राधिकरण गठित करने में कठिनाई क्या है? प्रश्न राष्ट्रीय नदी की अस्तित्व रक्षा का है। केंद्र राज्यों पर जिम्मेदारी डालकर अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता। राज्य अधिक धनराशि के प्रस्ताव भेजकर ही अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। स्वामी सानंद संघर्षरत हैं। हिंदू जागरण मंच, सिटीजन फार वाटर डेमोक्रेसी, राष्ट्रीय पानी मोर्चा, रामदेव आदि अनेक संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पहले भी आंदोलन किए हैं। वाराणसी में जनजागरण जारी है, लेकिन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले प्राधिकरण की बैठक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची। गंगा का अस्तित्व भारतीय संस्कृति और राष्ट्रभाव से जुड़ा हुआ है। गंगोत्री ग्लेशियर सिकुड़ रहा है, रास्ते में बांध हैं। नीचे हिंसक औद्योगिक सभ्यता। सरस्वती लुप्त हो गई, अब गंगा भी महाप्रयाण की तैयारी में हैं। भविष्य भयावह है, गंगाजल न अर्पण के लिए होगा, न तर्पण के लिए और न ही सिंचाई या विद्युत ऊर्जा के लिए। हम भारतवासी मरने के दिन भी दो बूंद गंगाजल नहीं पाएंगे। (लेखक उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

Monday, April 16, 2012

पिछले एक दशक में मरे 335 बाघ

देश के विभिन्न अभ्यारण्यों के भीतर और बाहर पिछले एक दशक में 335 से अधिक बाघों की मौत हुई। सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए सवाल के जवाब में यह जानकारी दी गई। जवाब में बताया गया, ‘‘पिछले दस साल में अन्य कारणों के अलावा शिकार, संघषर्, दुर्घटना और अधिक उम्र की वजह से कुल 335 बाघों की मौत हुई। इनमें सबसे अधिक 58 बाघ 2009 में मृत पाए गए। 2011 में 56 और 2007 2002 में 28-28 बाघ मृत पाए गए। प्रेस ट्रस्ट द्वारा मांगी गई जानकारी पर राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकार (एनटीसीए) ने बताया कि 2005 में शावकों सहित कुल 17 बाघ मृत पाए गए। 2003 और इस वर्ष जनवरी से मार्च के बीच 16-16 बाघ मृत पाए गए। जबकि 2006 में 14 बाघ मृत पाए गए। आंकड़ों के अनुसार 68 बाघ इस अवधि के दौरान अवैध शिकार के कारण मारे गए। अवैध शिकार के कारण वर्ष 2010 में सबसे ज्यादा 14 बाघों की मौत हुई। 2009 में इनकी संख्या 13, 2011 में 11, 2002 में नौ, 2007 और 2008 में छह- छह, 2006 में पांच, इस वर्ष जनवरी से मार्च तक तीन और 2004 में एक बाघ की मौत अवैध शिकार की वजह से हुई। इनके अलावा अन्य की मौत अधिक उम्र, भुखमरी, सड़क और रेल दुर्घटनाएं, करंट लगने और कमजोरी जैसे कारणों से हुई। दिलचस्प बात यह है कि तकरीबन बारह मामलों में बाघ के मरने की वजह मालूम नहीं हो सकी। 2003 में मारे गए दो बाघों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आज तक नहीं मिल पाई इसलिए इनकी मौत की वजह मालूम नहीं हो सकी। एनटीसीए से कहा गया था कि वह वर्ष 2002 से 2012 के बीच के दशक में विभिन्न अभ्यारण्यों में मारे गए बाघों की संख्या और उनकी मौत के कारणों की जानकारी मुहैया कराए। पर्यावरण और वन मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अनुसार किसी भी बाघ के मरने पर उसके अवशेषों को तब तक डीप फ्रीजर में सुरक्षित रखा जाता है, जब तक कि स्वतंत्र दल उसकी मौत के कारणों का विश्लेषण न कर ले। प्रत्येक बाघ की मौत की घटना की गहन जांच की जाती है।

Tuesday, March 20, 2012

पेयजल का संकट


भूजल में भारी धातुओं का पाया जाना कोई नई बात नहीं है, लेकिन पंजाब के मामले में यह खतरनाक स्तर की ओर जा रहा है। राज्य में कई जगहों पर यह जरूरत से अधिक है। यह रिपोर्ट खुद पंजाब सरकार के जलापूर्ति एवं सेनिटेशन विभाग की है। रिपोर्ट के अनुसार पंजाब के सात जिलों के भूजल में भारी धातुओं की मात्रा अधिक है। यहां पानी में जो भारी धातुएं पाई जा रही हैं, उनमें आयरन और मैगनीशियम के अलावा एल्यूमिनियम भी शामिल है। यह स्थिति अकेले पंजाब की हो, ऐसा भी नहीं है। अगर ठीक से सर्वेक्षण करवाया जाए और प्रयोगशालाओं में परीक्षण के बाद आकलन किया जाए तो शायद यह पाया जाएगा कि देश के अधिकतर क्षेत्रों में पेयजल की स्थिति काफी गंभीर है। देखने में यह जरूर लगता है कि भारत में पानी बहुत है, लेकिन सच्चाई यह है कि पानी की इस उपलब्ध मात्रा में से पीने लायक पानी बहुत कम है। इस तरह पेयजल के हिसाब से अगर देखें तो हमारे पूरे देश में पानी की उपलब्धता कम जगहों पर है। यह अलग बात है कि जानकारी और सुविधा के अभाव में लोग वही पानी पीने के लिए मजबूर हैं, जो सरलता से उपलब्ध है। पानी की कमी की यह समस्या केवल गांवों में ही हो, ऐसा भी नहीं है। यह समस्या गांवों से लेकर शहरों तक हर जगह है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के ही कई क्षेत्रों में पीने लायक पानी नहीं पाया जाता है। जहां पाया जाता है वहां भी उसका आधार पानी की पोषक गुणवत्ता नहीं, बल्कि केवल स्वाद को माना जाता है। यह दशा पूरे देश की है। अगर पानी का स्वाद खारा नहीं है तो उसे पीने लायक मान लिया जाता है। ऐसा केवल अशिक्षित और ग्रामीण लोग ही नहीं, शिक्षित और शहरी लोग भी करते हैं। यह सिर्फ अज्ञानता के कारण नहीं, कई तरह की मजबूरियों के भी कारण होता है। कहीं उपलब्धता नहीं है तो कहीं उसे किसी और तरह से प्राप्त कर पाने की क्षमता नहीं है। हर परिवार के बस की बात यह नहीं है कि वह खरीद कर पानी पी सके या खारे या अस्वास्थ्यकर पानी को पेयजल बनाने वाले उपकरण अपने घर में लगा सके। नतीजा यह है कि अधिकतर लोगों को अपनी क्षमता के अनुसार पानी पीना पड़ रहा है। संकट यह है कि जिन जगहों पर स्वास्थ्यकर पेयजल उपलब्ध है, वहां भी इसकी उपलब्धता बहुत दिनों तक ऐसी बनी रहने वाली नहीं है, क्योंकि खनिज तत्वों के अलावा बहुत भारी मात्रा में प्रदूषणकारी तत्व भी हमारे भूमिगत जल में मिल रहे हैं। प्रदूषण धीरे-धीरे पूरे भारत में मनुष्यता के लिए खतरा बनता जा रहा है। प्रदूषण की मात्रा बढ़ाने के लिए केवल छोटे-बड़े उद्योग ही नहीं, देश का आदमी खुद भी जिम्मेदार है। रोक लगाए जाने के बावजूद पॉलीथिन का प्रयोग पूरे देश में बेहिसाब हो रहा है। दुनिया भर का कूड़ा-कचरा नदियों में डाला जा रहा है। औद्योगिक कचरा नदियों में डाले जाने के पहले मानकों के अनुसार शोधित भी नहीं किया जा रहा है। पानी को प्राकृतिक रूप से शोधित करने के जो साधन हैं, उनमें से अधिकतर खत्म होते जा रहे हैं। वन क्षेत्र लगातार घट रहा है। विभिन्न कारणों से लकड़ी के लिए पेड़ काटने की प्रक्रिया निरंतर चल रही है और नए पेड़ लोग उतनी संख्यो में लगा नहीं रहे हैं। सरकारी स्तर पर भी नए पेड़ या तो लगाए ही नहीं जा रहे हैं या फिर लगाने के बाद उनकी ठीक से देखभाल नहीं हो पा रही है। जो पेड़ लगाए जा रहे हैं, वे भी हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के अनुकूल नहीं हैं। हम बिना सोचे-समझे विदेशी पौधे अपने देश में लगाते जा रहे हैं, जो हमारे लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं। इस तरह, अधिकतर क्षेत्रों में पानी के शोधन के प्राकृतिक उपाय नष्ट होते जा रहे हैं और देश का ज्यादातर उपलब्ध जल पीने के लिहाज से असुरक्षित होता जा रहा है। खुद विश्व बैंक की रिपोर्ट यह कहती है कि जलजनित रोगों में 88 प्रतिशत केवल असुरक्षित पानी पीने के चलते हो रहे हैं। पंजाब के कुछ सीमावर्ती इलाकों में यह समस्या काफी गंभीर है। जलजनित रोगों के मामले में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार की स्थिति भी कुछ ठीक नहीं है। दिल्ली में पानी की बढ़ती आवश्यकता को सरकारी तंत्र द्वारा पूरी न किए जा पाने का ही नतीजा है कि यहां पानी माफिया तक बन चुके हैं। ये राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कई जगहों से भूगर्भ जल का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं और उसे बेच रहे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि यहां भूगर्भ जलस्तर नीचे गिरता जा रहा है। इस लिहाज से पूरे भारत की स्थिति ठीक नहीं है। भूजल स्तर का नीचे गिरना अपने आपमें खतरे की एक घंटी है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार जल संकट की एक बड़ी वजह जनसंख्या में हुई बढ़ोतरी भी है। जनसंख्या बढ़ने के नाते पूरे विश्र्व में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन तो बेहिसाब हो रहा है, लेकिन उन्हें नए सिरे से विकसित करने की दिशा में कुछ भी नहीं किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में जल संकट का महत्वपूर्ण कारण कुप्रबंधन को बताया गया है। वे इसके लिए भ्रष्टाचार, नौकरशाही की अक्षमता, निवेश की कमी और बुनियादी ढांचे के अभाव को भी जिम्मेदार ठहराते हैं। खासकर भारत में तो स्थिति यह है कि अभी भी कई जगहों पर आम लोगों को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में तो इस मामले में कई जगह लोग अभी खुद ही जागरूक नहीं हैं। यह स्थिति बड़ी संख्या में जलजनित रोगों का कारण बन रही है। इन हालात से उबरने का हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए। सच तो यह है कि अगर केवल स्वास्थ्य के लिहाज से सुरक्षित पेयजल की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके तो पूरे देश में आए दिन होने वाले रोगों पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। इसके लिए गंभीरतापूर्वक प्रयास करने होंगे। शासन और प्रशासन से जुड़े लोगों को चाहिए कि सबसे पहले पूरे देश में उपलब्ध जल का समुचित प्रबंधन करने की व्यवस्था बनाएं। अगर केवल इसका समुचित प्रबंधन किया जा सके तो यही काफी हद तक हमारी समस्या का समाधान कर देगा। कुप्रबंधन का ही नतीजा है कि बहुत भारी मात्रा में पेयजल हमारे देश में बर्बाद हो जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह लीकेज है, जो कई तरह से हो रही है। इस पर काबू पाने की व्यवस्था तुरंत बनाई जानी चाहिए। साथ ही प्रदूषण की समस्या के प्रभावी समाधान की भी व्यवस्था जल्द से जल्द बनाई जानी चाहिए। जो जल पीने लायक नहीं है, उसके शोधन की भी व्यवस्था प्राथमिकता के साथ की जानी चाहिए। अगर ये काम कर लिए जाएं तो देशवासियों के स्वास्थ्य से जुड़ी एक बड़ी समस्या पर काबू पाया जा सकेगा। ध्यान रहे, यह लक्ष्य केवल सरकार के भरोसे किसी भी देश में नहीं हासिल किया जा सकता। नागरिकों का सहयोग इसके लिए अनिवार्य है और वह हमें करना ही होगा। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)

Wednesday, February 29, 2012

जहरीली हवा से हर साल तीन हजार मौतें


दिल्ली की हवा फिर से जहरीली हो चली है। प्रदूषण का जहर, शहर की हवा में तेजी से घुल रहा है। इसकी वजह से राजधानी में हर साल करीब तीन हजार मौतें हो रही हैं। शहर की हवा में पांव पसारता प्रदूषण का जहर कैंसर, हार्ट अटैक, सांस की बीमारियों सहित सेहत के लिए कई अन्य मुसीबतें खड़ी कर रहा है। इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव बच्चों पर हो रहा है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि शहर की 55 फीसदी आबादी इस वायु प्रदूषण की चपेट में है क्योंकि आबादी का यह हिस्सा मुख्य सड़कों के आसपास बसा हुआ है। दिल्ली सरकार को पेश की गई सेंटर फॉर साइंस एंड एनविरोनमेंट की एक रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है। इस रिपोर्ट में अमेरिका के हेल्थ इफेक्टस इंस्टीटयूट द्वारा टेरी के साथ मिलकर किए गए एक सर्वे के हवाले से बताया गया है कि दिल्ली में प्रतिवर्ष करीब एक लाख मौतें होती हैं जिनमें से तीन हजार मौतें वायु प्रदूषण के कारण होती हैं। सर्वे की यह रिपोर्ट वर्ष 2011 में प्रकाशित हुई थी। दस साल पहले दिल्ली सरकार ने डीजल के कारण बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए शहर में सीएनजी की शुरुआत की। तमाम बसें सीएनजी से चलाई जाने लगी। यहां कोयला से चलने वाले तीनों बिजली संयंत्र बंद कर दिए गए। प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को शहर से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इसके बावजूद वायु प्रदूषण में वृद्धि की वजह पूछने पर सेंटर फॉर साइंस एंड एनविरोनमेंट की अनुमिता राय चौधरी बताती हैं कि असली वजह यहां लगातार बढ़ रहे हैं वाहन हैं। इन्हीं की वजह से प्रदूषण बढ़ रहा है। उनका कहना है कि वाहनों पर लगाम लगाए बगैर वायु प्रदूषण को कम करना संभव नहीं होगा। दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग में तैनात आला अधिकारियों की राय में स्पो‌र्ट्स यूटिलिटी वैहकिल (एसयूवी) प्रदूषण को नए सिरे से हवा दे रहे हैं। इन बड़ी-बड़ी गाडि़यों से राजधानी की सेहत को खतरा हो रहा है। खुद मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी यह स्वीकार किया है कि वाहनों की बढ़ती संख्या दिल्ली के लिए मुसीबत साबित हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली की हवा में पार्टिकुलेट मैटर सबसे ज्यादा हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि चैन्नई, कोलकाता, मुंबई आदि शहरों में इसकी मात्रा में कमी आ रही है जबकि दिल्ली में यह बढ़ रहा है। एनओएक्स, एनओ2 तथा टीनियर पार्टिकल्स की मात्रा भी दिल्ली में बढ़ रही है। इन जहरीले पदार्थो की मात्रा आईटीओ चौराहा, पीतमपुरा, सिरी फोर्ट, शाहदरा तथा शाहजादा बाग में खतरनाक मात्रा में पाई गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि शहर में कार्बन मानोक्साइड की मात्रा में कमी आई है लेकिन सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर (पीएम10) समय पूर्व मौतों की प्रमुख वजह साबित हो रहा है। आर के पुरम तथा सिविल लाइन इलाके में पीएम 2.5 की मात्रा तय मानकों से कई गुना ज्यादा पाई गई है। बता दें कि दिल्ली में इस वक्त वाहनों की कुल संख्या 70 से 75 लाख के बीच है और प्रतिदिन यहां पर एक हजार से 1200 नए वाहन पंजीकृत होते हैं।

Wednesday, February 15, 2012

यूरोपीय संघ के खिलाफ तने भारत-चीन


यह ऐसी लड़ाई है, जिसे भारत और चीन पूरी एकजुटता से लड़ रहे हैं। मंगलवार को भी दोनों देशों ने पर्यावरण परिवर्तन के नाम पर लिए गए यूरोपीय संघ के एकतरफा फैसलों के खिलाफ खुल कर आवाज उठाई। साथ ही कहा है कि इस लड़ाई में उन्हें अपनी भूमिका का पूरी तरह ख्याल है। बेसिक देशों (भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील) के पर्यावरण मंत्रियों की यहां चल रही बैठक में पारित प्रस्ताव के तहत विकसित देशों के खिलाफ संघर्ष को जारी रखने का खुला संकेत दिया है। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि पर्यावरण परिवर्तन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय युद्ध में विकासशील देशों अपनी भूमिका को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। इन देशों ने अपने कदमों के जरिए लगातार इस बात को साबित भी किया है। पर्यावरण मंत्रियों ने कहा है कि विकसित देशों को भी अपनी एतिहासिक भूमिका को ध्यान में रखते हुए तुरंत सक्रियता दिखानी चाहिए। समानता के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए अपनी जवाबदेही पूरी करनी चाहिए। साझा बयान के मुताबिक विभिन्न देशों की क्षमता और एतिहासिक भूमिका के मुताबिक इस काम में उनकी हिस्सेदारी तय होनी चाहिए। यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन फॉर क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी पर्यावरण मंत्रियों ने यूरोपीय संघ के उत्सर्जन व्यापार योजना की भी जोरदार निंदा की है। बैठक में भाग ले रहे चीन के राष्ट्रीय विकास और सुधार आयोग के उपाध्यक्ष शिया जेनहुआ ने इसे पूरी तरह एकतरफा कदम बताया। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में इसका जोरदार विरोध होने के बावजूद यूरोपीय संघ ने इसे लागू कर दिया है। भारत की पर्यावरण राज्यमंत्री जयंती नटराजन ने भी उनके सुर से सुर मिलाते हुए कहा कि पर्यावरण परिवर्तन के नाम पर उठाया गया यह कदम पर्यावरण को ले कर अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को गंभीर नुकसान पहुंचाएगा। दो दिन चली इस बैठक की शुरुआत सोमवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की थी। बेसिक देशों के पर्यावरण मंत्रियों की अगली बैठक इस साल की दूसरी तिमाही में होगी और इसकी मेजबानी दक्षिण अफ्रीका करेगा।

Tuesday, February 14, 2012

सिमटते जंगल, विकराल होती मुसीबतें


पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित दिल्ली स्थायी विकास सम्मलेन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के जंगलों की स्थिति पर जो जानकारी दी थी, उसे उन्हीं की सरकार के एक मंत्रालय द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण ने गलत साबित कर दिया है। दरअसल, प्रधानमंत्री ने बताया था कि देश में वर्ष 1997 से वर्ष 2007 के बीच जंगलों की संख्या और क्षेत्र में पांच फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। प्रधानमंत्री ने उम्मीद भी जताई थी कि हरित मिशन के तहत जल्द ही 50 लाख हेक्टेयर भूमि पर वन क्षेत्रों का विकास कर लिया जाएगा। लेकिन पिछले दिनों वन सर्वेक्षण-2011 की जो रिपोर्ट आई है, वह प्रधानमंत्री के दावे को गलत साबित करती है। वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के वन क्षेत्रों में 367 किलोमीटर की कमी आई है और अब जंगल के कुल क्षेत्रफल का महज 23.81 प्रतिशत हिस्सा ही बचा हुआ है। सर्वेक्षण की यह ताजा रिपोर्ट बताती है कि सर्वाधिक आदिवासी इलाकों में वन्य क्षेत्र घटे हैं। यहां कुल 679 किलोमीटर वन्य भूमि कम हुई है। इसी तरह पहाड़ी इलाकों में 548 किलोमीटर वन्य क्षेत्र घटे हैं। सर्वेक्षण के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 3, आंध्र प्रदेश में 281, मणिपुर में 190 तथा नगालैंड में 146 किलोमीटर वन्य रकबा घटा है। दूसरी तरफ पंजाब में 100, झारखंड में 83, बिहार में 41, हरियाणा में 14, हिमाचल प्रदेश में 11 और जम्मू-कश्मीर में 2 किलोमीटर वन्य भूमि का विस्तार हुआ है। मणिपुर, नगालैंड, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश में वनों के रकबे में कमी का सर्वाधिक असर आदिवासियों और जंगली जानवरों पर पडे़गा। बहरहाल, पर्यावरण और जलवायु संकट के बीच वनों के क्षेत्रफल में गिरावट का सीधा असर हम इंसानों पर पड़ेगा। आज न सिर्फ भारत में वनों की संख्या और क्षेत्रफल में गिरावट आ रही है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी निरंतर जंगल घटते जा रहे हैं। पिछले दिनों दक्षिण अफ्रीका के डरबन में पर्यावरण सुरक्षा पर वैश्विक सम्मलेन के बीच ही संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट सामने आई थी। यह रिपोर्ट हमारी चिंताओं को और भी बढ़ाने वाली थी। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पूरे विश्व में हर साल औसतन 50 लाख हेक्टेयर वन्य क्षेत्र काटे जा रहे हैं। इससे अब धरती पर महज 30 प्रतिशत ही वन्य क्षेत्र बचा है। पर्यावरण संकट के बीच यह एक और दुर्भाग्य पूर्ण जानकारी है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई ने पर्यावरण असंतुलन का काम किया है। इससे न केवल पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हुई हैं, बल्कि वन्यजीवों का भी सफाया होता जा रहा है। ये वन्यजीव कई मायने में इंसान के हितैषी होते हैं, जिनका लुप्त होना इंसान के लिए खतरे की घंटी है। खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार, 1990 से 2005 के बीच पूरे विश्व में मौजूद करीब 7 करोड़ हेक्टेयर वन संपदा समाप्त हो चुकी है। यह वन्य संपदा देश के आर्थिक विकास में काफी मददगार होती है। कई जनजातियों की आजीविका भी सीधे वन्य संपदा से ही जुड़ी होती है। देश के जंगलों के बढ़ने-घटने का हिसाब रखने वाले फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार पिछले पांच सालों में भारत में बनने वाले बड़े बांधों और सुनामी के कहर से 728 वर्ग किलोमीटर जंगली क्षेत्र पूर्णत: नष्ट हो गया। सिर्फ 2003 और 2005 के बीच में ही 1409 वर्ग किलोमीटर जंगल क्षेत्र नष्ट हुआ था। एक समय जहां भारत में 50 प्रतिशत से भी अधिक जंगल थे, वहीं बाद में यह अपने सबसे निम्नतम स्तर यानी घटकर 20 प्रतिशत के आस-पास पहुंच गए। कटिबंधीय क्षेत्रों में सर्वाधिक जंगल काटे गए हैं और वहां अब कृषि योग्य भूमि विकसित कर दी गई है। भारत में वर्ष 1951 से 1972 के बीच 34 लाख हेक्टेयर वन्य क्षेत्रों को उद्योगों, बांधों, सड़कों आदि के लिए काटा गया। भारत में वनों को नष्ट करने की यह रफ्तार अब भी लगभग 10 लाख हेक्टेयर प्रतिवर्ष है। इस आंकड़े में उन वनों की कटाई का आंकड़ा नहीं है, जहां गैरकानूनी तरीके से वन काटे जा रहे हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई और इंसानों के बढ़ते दखल से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ा है। इसके साथ ही ओजोन परत का भी क्षय होता जा रहा है। ग्लोबल वॉर्मिग से हमारे कृषि उत्पादन भी घटते जा रहे है, जिससे खाद्य संकट की स्थिति पैदा हो गई है। चूंकि जंगल अचानक आने वाली बाढ़ों से मिट्टी के कटाव को रोकने में भी प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं, इस लिहाज से भी जंगल के संरक्षण की जरूरत है। हमने 1968 में तीस्ता, 1970 में अलकनंदा और 1978 में भागीरथी नदी की बाढ़ की विभीषिका को देखा है। इन सबके बावजूद हम उन मानवीय गलतियों से सबक नहीं लेते। हालांकि वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के प्रयास हो रहे हैं, लेकिन सबका ध्यान सिर्फ कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर ही है। किसी का ध्यान जंगल के संरक्षण की ओर नहीं जाता। जरूरी तो यह है कि पहले हम अपने वन्य क्षेत्रों समृद्ध और इनकी रक्षा करें। हालांकि जिस प्रकार देश में औद्योगिक तरक्की होती जा रही है और खाली भूमि का मिलना कम होता जा रहा है, ऐसी स्थिति में वनों का संरक्षण एक बड़ी चुनौती है। भारत में 1952 की वन नीति के तहत 33 प्रतिशत भूमि को वनों के अंतर्गत लाने की बात की गई थी, लेकिन 1951 से 1980 के दरम्यान बहुत कम प्रगति हुई। हरित की गई कुल 31.8 लाख हेक्टेयर भूमि में से केवल 6 लाख हेक्टेयर (लगभग 19 प्रतिशत) भूमि पर पौधे लगे। राष्ट्रीय नीति-1988 में क्षरित वनों की सुरक्षा और उनके प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भागीदारी का उद्देश्य सामने रखा गया था, लेकिन इसका भी उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं निकला। इस बीच मनरेगा और अन्य योजनाओं के जरिए वृक्षारोपण का अभियान चलाकर भारत सरकार एक सराहनीय पहल कर रही है, लेकिन पर्यावरण की समस्या इतनी विकराल हो चुकी है कि इस ओर वैश्विक स्तर पर मुहिम छेड़ने की जरूरत है। चंद देशों में वृक्षारोपण जैसे अभियान चलाकर समस्या का समाधान नहीं होने वाला। हमें तत्काल जंगलों की सुरक्षा के प्रति उचित रणनीतियां अपनानी होंगी। बढ़ते पारिस्थितिकी असंतुलन के प्रति भी हमें ध्यान देना होगा और इसके लिए हमें वैश्विक स्तर पर पहल करनी होगी। सीमित स्वार्थो को तिलांजलि देकर पूरे विश्व के सामाजिक और पर्यावरणीय हितों को सर्वोपरि रखना होगा। जंगलों के काटे जाने का प्रमुख कारण है विकास और व्यावसायिक हितों के लिए किए जा रहे कार्य। उदाहरण के तौर पर देखें तो हिमाचल प्रदेश सरकार अपने कुल राजस्व का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा करीब दो लाख वृक्षों की आहुति देकर हासिल करती है। साथ ही चीड़ के वृक्ष से रस निकालने का सिलसिला भी इसे खत्म कर रहा है। आर्थिक विकास के बीच अगर हम इसी रफ्तार से अपने आसपास के हरे वृक्षों और जंगल को नष्ट करते रहे तो इंसान का अस्तित्व खतरे में पड़ना स्वाभाविक है। लिहाजा, हमें ग्रीन ग्रोथ की ओर बढ़ना होगा। यानी ऐसी तरक्की, जहां हरियाली का नाश न हो और विकास की रफ्तार भी बनी रहे। साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का जितना प्रयोग किया जाए, उसकी भरपाई भी सुनिश्चित की जाए। अगर किसी कारण से कोई हरा पेड़ काटना पड़े तो इसकी भरपाई तभी हो सकती है, जब हम तीन-चार पौधे लगाएं। जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले 15 वर्षो के दौरान नए शहरों के निर्माण और विकास के नाम पर प्रत्येक मिनट 9.3 हेक्टेयर क्षेत्र के वन उजाड़े गए हैं, इस तरह क्या हमने प्रकृति से आफत नहीं मोल ली है? वास्तव में हम जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को काट रहे हैं। अब भी वक्त है। अगर हम नहीं चेते और जंगलों का खात्मा ऐसे ही होता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मानव जीवन खतरे में पड़ जाएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)