Saturday, June 30, 2012

पर्यावरण संरक्षण


विकास की राह पर सरपट भागने की होड़ में मनुष्य पृथ्वी पर अपने सहजीवियों को तेजी से नष्ट करता जा रहा है। समय-समय पर दुनिया से कुछ और जीवों के सदा के लिए विलुप्त होने की रिपोर्ट आती रहतीं हैं और हम सिर्फ घडि़याली आंसू बहाते हुए अफसोस जाहिर करते हैं। हालांकि बाद में फिर उन्हीं कामों में संलिप्त हो जाते हैं और यह सिलसिला चलता रहता है। दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील में राजधानी रियो में पिछले हफ्ते हुए रियो-20 पृथ्वी सम्मेलन के दौरान एक रिपोर्ट पेश की गई जिसमें बताया गया कि मेंढकों में एक और भारतीय प्रजाति के अलावा पेड़-पौधों की छह प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं। भारत में मेंढक की जो प्रजाति सदा के लिए लुप्त हो गई है वह पत्तों में रहने वाला और हरे पत्तों जैसा दिखने वाला छोटा सा मेंढक। यह सूची यहीं नहीं खत्म हो जाती है, बल्कि विलुप्ति के कगार पर भारत के अभी 132 और जीवों का नाम है। इन लुप्तप्राय जीवों में स्तनधारियों की 10, चिडि़यों की 15, मछलियों की 14 और कछुआ, मेंढक तथा घडि़याल समेत 18 अन्य प्रजातियां शामिल हैं। इन जीव-जंतुओं के अलावा भारत में पेड़-पौधों की 60 किस्में ऐसी हैं जो धरती पर अपना वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। आइयूसीएन ने अपनी रेड लिस्ट में चेतावनी जारी करते हुए बताया है कि पूरी धरती पर गिने गए 63,837 प्रजातियों में से 19,817 विलुप्त होने की कगार पर हैं। इनमें कुल उभयचरों में 41 फीसदी, मूंगों में 33 फीसदी और 25 फीसदी स्तनधारी प्राणी हैं। इनके अलावा पक्षियों में 13 फीसदी और शंकुवृक्ष में 30 फीसदी खतरे की निशान पर हैं। इस सूची से धरती पर जैविक विविधता घोर संकट में दिख रही है। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करने वाला इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर यानी आइयूसीएन दुनिया के सबसे पुराने और विशाल संगठनों में से एक है। पांच अक्टूबर 1948 को स्थापित आइयूसीएन का लक्ष्य एक ऐसी दुनिया का निर्माण करना है जहां मूल्यों और प्रकृति का संरक्षण बेहतर तरीकों से हो सके। वन्य जीवों और पेड़-पौधों के बारे में आइयूसीएन लगातार दुनिया को चेताती रही है, लेकिन ऐसा लगता है कि कोई भी देश सिवाय रस्म अदायगी के और कुछ नहीं करना चाहता है। भारत ही नहीं दुनिया के लगभग सभी देशों में वन्य जीवों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। आइयूसीएन ने जो रेड लिस्ट जारी की है उससे विश्व की जैविक विविधता में अंतर को देखा जा सकता है। कुछ दिन पूर्व ही इक्वाडोर में एक विशालकाय कछुए की मौत के साथ ही पिंटा प्रजाति के कछुए की भी दुनिया से दुखद विदाई हो गई। हालांकि इस दक्षिण अमेरिकी देश के गलपागो राष्ट्रीय पार्क में इस कछुए के जरिये इसकी प्रजाति को बचाने की हरसंभव कोशिश की गई, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी। गलपागो द्वीप में 19वीं शताब्दी तक कछुओं की अच्छी-खासी आबादी थी, लेकिन शिकारियों द्वारा मांस के लिए अंधाधुंध शिकार करने से इनकी संख्या अंगुलियों तक सिमट गई। रही-सही कसर बकरियों ने पूरी कर दी, क्योंकि इनके आने से कछुओं को रहने में दिक्कतें आने लगी। सौ साल से भी ज्यादा का वसंत देखने वाले इस विशालकाय कछुए को अब रासायनिक लेप के जरिये संजोकर रखा जाएगा। आस्ट्रेलिया का विश्व प्रसिद्ध ग्रेट बैरियर रीफ जिसे यूनेस्को ने वैश्विक धरोहर घोषित किया है पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। कोरल सागर में मछलियों के लगातार शिकार और तेल तथा गैस की खोज के कारण धरती के नीचे की यह रंगीन दुनिया भी तेजी से सिमटती जा रही है। आइयूसीएन की रेड लिस्ट में कहा गया है कि यूरोप में कुल स्थानीय तितलियों में 16 फीसदी संकट में हैं। वहीं चमगादड़ जो परागण करने में अहम भूमिका निभाता है वैश्विक स्तर पर 18 फीसदी खत्म होने की कगार पर है। दूसरी ओर गुनगुनाने वाली चिडि़या परिवार की चार चिडि़यों पर खतरा दिख रहा है जिसमें प्रमुख दक्षिण अमेरिका में पाई जाने वाली पिंक थ्रोटेड ब्रिलियंट चिडि़या है। परागण करने वाले चमगादड़ और चिडि़यों जैसी प्रजातियों की भूमिका बहुत अहम होती है ये लोग कीटों की संख्या को बढ़ने से रोकते हैं जो कीमती पौधों को नष्ट करते हैं। रेड लिस्ट में दुनिया को सचेत किया गया कि चीन और दक्षिण पूर्व एशिया में पाए जाने वाले सांपों में 10 फीसदी सांपों का अस्तित्व संकट में है। परंपरागत दवाइयों और विषरोधी दवा बनाने के लिए सांपों का अंधाधुंध प्रयोग किए जाने से उन पर भी गंभीर संकट है। अमेरिका समेत कई विकसित देशों में दवाइयों में वन्य प्रजातियों का जमकर प्रयोग किया जाता है। उभयचर प्राणी नई दवाइयों की खोज में अहम भूमिका निभाते हैं जो उनके विनाश के कारण बन रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार 70 हजार से ज्यादा पेड़-पौधों का इस्तेमाल परंपरागत और आधुनिक दवाइयों के लिए हो रहा है। हाथी दांत के लिए हाथियों का शिकार लंबे समय से हो रहा है लेकिन पिछले दो दशकों में शिकार में काफी तेजी आई है। द कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन डैंजर्ड स्पेसीज ऑफ वाइल्ड फॉन एंड फ्लोरा यानी सीआइटीईएस ने कई देशों की सरकारों द्वारा जमा की सूचना के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की है। एक आंकड़े के अनुसार पिछले साल अवैध हाथीदांत के 14 बड़े खेप पकड़े गए। पिछले 23 सालों में ऐसा पहली बार हुआ जब किसी एक साल में दोहरी संख्या में इन अवैध खेपों को पकड़ा गया। अंधाधुंध विकास के कारण भारत को खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है, उसकी जैव विविधता खतरे में नजर आ रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार जैव पारिस्थितिकी में आए संकट के लिए अवैध खनन, पेड़ आच्छादित जगहों की कमी और कंट्रीट के खड़े होते नए जंगल जिम्मेदार हैं। वन्यजीवों के रहने लायक जंगल न रहने से उनके अस्तित्व पर संकट है। न सिर्फ जीवों पर संकट है, बल्कि कई पेड़-पौधे भी धरती पर अपने जीवन के लिए संघर्षरत हैं। पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि गिर जंगल के प्रसिद्ध एशियाई शेर रायल बंगाल टाइगर और भारतीय गिद्ध विलुप्ति की कगार पर हैं। दर्द निवारक दवा डाइक्लोफेनेक इनके लिए काल साबित हो रही है। दरअसल ये मरे हुए मवेशियों का सड़ा हुआ मांस खाने को मजबूर हैं, जिनका कभी डाइक्लोफेनेक दवा से इलाज हुआ हो। इतना ही नहीं पश्चिमी घाट के मशहूर गहरे रंग वाले नीलगिरी बंदर और देशी मेंढक भी लुप्त होने के करीब पहुंच गए हैं। जंगल काटकर खेत बनाने और नदी व तालाब सूखा कर बड़ी-बड़ी बिल्डिगं बनाने की चाह रखने वाले देश यह नहीं सोचते कि जब जंगल और नदी-तालाब ही नहीं रहेंगे तो इन जगहों पर रहने वाले कहां जाएंगे? लगातार जंगल नष्ट होने के कारण वन्यजीवों पर रहने का संकट बना हुआ है जिससे उनकी आबादी में निरंतर गिरावट आ रही है। यूं तो पूरी दुनिया में विकास का पहिया तेजी से घूम रहा है पर हर देश विकास की अंधाधुंध दौड़ में उन चीजों को नष्ट करने पर तुले हुए हैं जो उनके पर्यावरण मित्र हैं। यह भी हास्यास्पद है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं, लेकिन इनका कोई परिणाम नहीं निकलता।

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