Wednesday, March 30, 2011

जहरीला होता यमुना का पानी


 हमारे मुल्क में नदियों के अंदर बढ़ते प्रदूषण पर आए दिन चर्चा होती रहती है। प्रदूषण को रोकने के लिए गोया कि बरसों से कई बड़ी परियोजनाएं भी चल रही हैं, लेकिन नतीजे के स्तर पर देखें तो वही ढाक के तीन पात। प्रदूषण के हालात इतने भयावह हो गए हैं कि हमारे सामने पेयजल तक का संकट गहरा गया है। राजधानी दिल्ली के 55 फीसदी लोगों की जीवनदायिनी, उनकी प्यास बुझाने वाली यमुना के पानी में जहरीले रसायनों की तादाद इतनी बढ़ गई है कि उसे साफ कर पीने योग्य बनाना तक मुश्किल हो गया है। बीते एक महीने में दिल्ली में यह दूसरी बार है, जब ऐसे हालात के चलते पेय जल शोधन संयंत्रों को रोक देना पड़ा। चंद्राबल और वजीराबाद के जलशोधन केंद्रों की सभी इकाइयों को महज इसलिए बंद करना पड़ा कि पानी में अमोनिया की मात्रा 0.02 से बढ़ते-बढ़ते 1.3 हो गई है, जिससे पानी जहरीला हो गया। जाहिर है, दिल्लीवासियों के लिए यह अच्छी खबर नहीं है। गर्मियों ने दस्तक दे दी है और समय रहते यदि इस समस्या पर पार नहीं पा लिया गया तो हालात और ज्यादा विकराल हो जाएंगे। कोई 15 दिन पहले जब यह शिकायत मिली थी तो पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने हस्तक्षेप किया था। पिछले दिनों यमुना के हालात का उन्होंने जायजा भी लिया, लेकिन देखना होगा कि नतीजा क्या निकलता है। वैसे बार-बार शिकायतें मिलने के बावजूद सरकार जहरीला पानी छोड़ने वाले कारखानों के खिलाफ कोई कठोर कदम नहीं उठा पा रही है। पानी में जहरीले रसायनों की तादाद ज्यादा होने को लेकर हरियाणा सरकार और दिल्ली जल बोर्ड के बीच कई दिनों से आपस में तनातनी चल रही है। दिल्ली जल बोर्ड का कहना है कि हरियाणा के उद्योगों द्वारा यमुना नदी में जो कचरा डाला जाता है, उसकी वजह से ही यमुना के पानी में अमोनिया की मात्रा ज्यादा हो गई है। जल बोर्ड ने इसकी शिकायत केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड से भी की, लेकिन कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला। जबकि खुद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कल-कारखानों से निकलने वाले पानी के संबंध में कड़े कायदे-कानून बना रखे हैं। इस बात को भी अभी कोई ज्यादा दिन नहीं बीते हैं, जब जयराम रमेश ने कानपुर में एलान किया था कि नदियों में मिलने वाले जहरीले रसायनों की जबावदेही आखिरकार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की होगी। यदि इस मामले में वह नाकाम साबित होता है तो उसके खिलाफ कड़े कदम उठाए जाएंगे। रमेश ने उस वक्त इससे मुताल्लिक निर्देश पत्र भी जारी किए, लेकिन फिर भी हरियाणा व उत्तर प्रदेश के औद्योगिक इलाकों पानीपत और बागपत में लगे कारखानों का विषैला पानी बिना रुके यमुना में लगातार गिरता रहा। यमुना के पानी के प्रदूषण के लिए सिर्फ अकेला हरियाणा ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि इसमें दिल्ली भी शरीक है। शीला सरकार ने एक समय राजधानी के इलाकों में चल रहे कल-कारखानों को दिल्ली से बाहर बसाने के लिए बाकायदा एक मुहिम चलाई, जगह-जगह जल, मल शोधक संयत्र लगाए, लेकिन हालात आज भी ऐसे बने हुए हैं कि हजारों कारखाने रिहाइशी इलाकों के आसपास बने हैं और तिस पर रख-रखाव में लापरवाही के चलते ज्यादातर शोधन संयत्र भी काम करना बंद कर चुके हैं। पिछले दिनों हुए राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े बुनियादी ढांचा संबंधी विकास कार्यो ने भी यमुना को प्रदूषित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। बीते कुछ सालों में दिल्ली में न सिर्फ वायु प्रदूषण बढ़ा है, बल्कि उसी रफ्तार में जल प्रदूषण भी बढ़ा है। कारखानों से निकलने वाला कचरा यमुना में लगातार गिरता है। औद्योगिक इकाइयां ज्यादा मुनाफे के चक्कर में कचरे के निस्तारण और परिशोधन के जानिब कतई संवेदनशील नहीं हैं। पसमंजर यह है कि यमुना के 1,376 किलोमीटर लंबे रास्ते में मिलने वाली कुल गंदगी में से महज दो फीसदी रास्ते यानी 22 किलोमीटर में मिलने वाली दिल्ली की 79 फीसदी गंदगी ही यमुना को जहरीला बनाने के लिए काफी है। मुल्क में सबसे ज्यादा पूज्यनीय माने जाने वाली गंगा और यमुना नदी बढ़ते-बढ़ते इतनी प्रदूषित हो गई हैं कि दोनों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकार अब तक 15 अरब रुपये से अधिक खर्च कर चुकी है, लेकिन फिर भी उनकी मौजूदा हालत 20 साल पहले से कहीं ज्यादा बदतर है। गोया कि गंगा को राष्ट्रीय नदी एलान किए जाने के बावजूद इसमें प्रदूषण का स्तर जरा-सा भी कम नहीं हुआ है। यमुना सफाई अभियान के नाम पर भी सरकार ने काफी पैसा खर्च किया, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। करोड़ों रुपये यमुना की सफाई के नाम पर बहा दिए गए, मगर रिहाइशी कॉलोनियों और कल-कारखानों से निकलने वाले गंदे पानी का का कोई माकूल इंतजाम नहीं किया गया। जाहिर है, जब तलक यह गंदा पानी यमुना में गिरने से नहीं रोका जाता, तब तलक यमुना सफाई अभियान की सारी मुहिम फिजूल हैं। सूबाई सरकारें और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड दोनों ही कल-कारखानों की मनमानियों की जानिब आंखें मूंदे रहते हैं। नदियों में जहरीले पानी गिराने वाले कारखानों के खिलाफ कोई कठोर कदम नहीं उठाया जाता। कहने को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कायदे-कानून बना रखे हैं। फिर भी नदियों में गंदे पानी का प्रवाह रुक नहीं पा रहा है। पर्यावरण मंत्रालय की नाक के नीचे पड़ोसी सूबों के कल-कारखानों से निकलने वाला लाखों लीटर गंदा पानी यमुना में आकर मिल जाता है और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है। देखा जाए तो यह साफ तौर पर कोई कार्रवाई न होने या उन्हें ढिलाई देने का ही नतीजा है। ज्यादातर औद्योगिक इकाइयां रसूख वाले लोगों की हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड औद्योगिक-राजनीतिक दबाव के चलते औद्योगिक इकाइयों पर कोई कार्रवाई नहीं करता। अगर कोशिश करता भी है तो वे अपने सियासी रसूख की वजह से बच निकलते हैं। जिसकी वजह से प्रदूषण बदस्तूर जारी रहता है। कुल मिलाकर इस पूरे मामले में दिल्ली सरकार भले ही हरियाणा सरकार को गुनहगार ठहराकर खुद को पाक-साफ साबित करने की कोशिश करे, लेकिन यमुना की साफ-सफाई में वह खुद कितनी संजीदा है, यह किसी से छिपा नहीं है। प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करके ही यमुना को प्रदूषण से बचाया जा सकता है। विकास की अंधी दौड़ और मानव निर्मित प्रदूषण ने आहिस्ता-आहिस्ता हमारी नदियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। आलम यह है कि फिलवक्त मुल्क की 70 फीसदी नदियां प्रदूशित हैं और मरने की कगार पर हैं। नदियों में बढ़ता प्रदूषण केवल पेयजल की दृष्टि से ही बड़ी समस्या नहीं है, बल्कि इसके चलते आसपास के इलाकों में भू-जल के प्रदूषित होते जाने की वजह से लोगों में कई बीमारियां घर करती जा रही हैं। यही नहीं, खेतों की उर्वरा-शक्ति भी लगातार क्षीण हो रही है। सरकारों को राजनीतिक स्वार्थ और आपसी आरोपों-प्रत्यारोपों से ऊपर उठकर अवाम की सेहत और पर्यावरण की चिंता पहले करनी होगी, तब जाकर कुछ हालात सुधरेंगे। दिल्ली में पेयजल संकट की इस छोटी-सी मिसाल ने हमारे सामने भविष्य की भयावह तस्वीर खींचकर रख दी है। यदि समय रहते अब भी हमने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की तो बहुत देर हो जाएगी|

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