Wednesday, February 2, 2011

पहाड़ों से कहीं लुप्त न हो जाएं जड़ी-बूटियां


प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से भरपूर जम्मू-कश्मीर में सरकार की बेरुखी से दर्जन भर से अधिक बूटियां विलुप्त होने को हैं। आधा दर्जन का अस्तित्व खतरे में है। हालांकि औषधि गुणों वाली इन बूटियों को बचाने के लिए सेमिनार तो कई हुए, लेकिन इन्हें संरक्षित करने का काम नहीं हुआ। फाउंडेशन फॉर रेविटलाइजेशन ऑफ लोकल हेल्थ ट्रडिशनल (एफआरएनएचटी) ने हाल ही में शिमला में आयोजित कार्यशाला में पुष्टि की कि हिमालय क्षेत्र की तकरीबन 30 बूटियां दुर्लभ और अति दुर्लभ श्रेणी में आ गई हैं। इसमें 10 किस्म की बूटियों पर सबसे ज्यादा संकट है, जो 90 फीसदी तक घट चुकी हैं। जम्मू-कश्मीर में 8 से 10 किस्म की कीमती बूटियां अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। आयुर्वेदिक दवाओं में इस्तेमाल होने वाली कारू बूटी प्रदेश में 80 फीसदी घट चुकी है। राज्य के बनी, बंजाल, पंचैरी, चिनाब, पीर पंजाल व कश्मीर में यह जड़ी कभी बहुतायत में हुआ करती थी। ककोली बूटी तो अब लगभग गायब ही हो गई है। वूडी एंड हर्बल मेडिकल प्लांट नामक किताब में कहा गया है कि प्रदेश के सिमथन पास, मचैल, सरथल व पत्नीटॉप में यह बूटियां अब नहीं दिखती। कुथ जिसकी जड़ें बेहद कीमती हैं, को बेचकर सरकार ने खूब कमाई की। स्टेट फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट जम्मू कश्मीर ने एक सर्वेक्षण में पाया कि कुछ क्षेत्रों में कुथ की संख्या काफी घट गई है। कीरत (स्वीटेरिया) की जंगली बूटी बेहद दुर्लभ हो गई है। हर्बल दवाओं में इस्तेमाल होने वाली यह बूटी हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड में तो कुछ हद तक मौजूद है, लेकिन जम्मू कश्मीर में इसकी उपस्थिति पर संदेह ही रह गया है। नीले फूल वाली मीठा तेलिया बूटी कश्मीर के सोनमर्ग, बालटाल, जंस्कार व गुलाम कश्मीर में लगातार गिरती जा रही है। हृदय रोग में काम आने वाली रतनजोत जम्मू कश्मीर के वादवान, सोनमर्ग, काउबल, जंस्कार, पाडर, किश्तवाड़ व दक्छन के पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार गिर रही है। रतन मुंडी बूटी ठंडे बर्फानी इलाके जैसे लद्दाख की सो मरारी झील के आसपास पहले बहुतायत में पाई जाती थी, अब काफी कम हो गई है। पुंछ, गुलमर्ग, गुरेज, मचैल, छतरगाला, परकाशिक में जलकाफल बूटी घटने लगी है। वन बूटियों के जानकार ओपी विद्यार्थी कहते हैं कि इनको संभालने के लिए केंद्र व राज्य सरकार को बड़े स्तर पर काम करना होगा। जम्मू कश्मीर फ्लावर ग्रोअर्स एसोसिएशन के प्रधान तेजेंद्र सिंह कहते हैं कि नेशनल मेडिसीनल प्लांट मिशन का प्रोजेक्ट होते हुए भी इसकी नर्सरी बनने का अभी इंतजार है।



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